क्या क्षमा ही है सबसे बड़ा धर्म?

सूर्य के तीव्र ताप से पृथ्वी झुलस रही हो और अचानक बारिश की बूंदों से उसका ताप नियंत्रित हो जाए और उसके अंतस को इतना शीतल कर दे कि ताप फिर उसे झुलसा न पाए, उसकी नमी को न सोख पाए. हमारे जीवन में क्षमा यही नमी बरकरार रखती है.

जिसके पास देने को क्षमा है वही सबसे धनवान है और इसलिए ही ईश्वर सबसे अधिक धनी हैं. वे हमें हमारे द्वारा किए गए अनगिनत अपराधों को क्षमा कर देते हैं, अगर हम उनके इस एक गुण को अपने जीवन का हिस्सा बना लें.

दरसल हम ईश्वर की आड़ में स्वयं से ही क्षमा मांग रहे होते हैं, अपने अपराधों की. हमारे अंदर की पश्चाताप की भावना ही हमें क्षमा मांगने और क्षमा करने के योग्य बनाती है.

पोप फ्रांसिस कहते हैं कि ईश्वर से अपने अपराधों की क्षमा मांग कर हम दूसरे अपराधों के लिए तैयार न हों, बल्कि उन गलतियों का हृदय से पश्चाताप करें और उन्हें ना दोहराएं.

जब तक आपके मन में पश्चाताप की भावना नहीं तब तक ईश्वर आपको क्षमा नहीं करेगा.

भगवान महावीर ने क्षमा को सबसे बड़ा धर्म बताया और अपने अनुयायियों को मन, वचन और काया से क्षमा करना और क्षमा मांगना सिखाया. क्षमा का सभी धर्मों में सबसे ऊंचा स्थान है.

दार्शनिक गौतम चटर्जी कहते हैं, क्षमा का मेरे जीवन में कोई स्थान नहीं, मेरे जीवन में प्रेम का स्थान है वह भी ईश्वरीय प्रेम का. जब प्रेम उत्कृष्ट होगा तो क्षमा करने या मांगने की आवश्यकता ही नहीं होगी. और इस तरह के प्रेम के लिए आपको ईश्वर के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होना होता है.

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