हम सेलेक्टिव एक्टिविज्म क्यों करते हैं?

कुछ प्रश्न हैं, जो अक्सर मस्तिष्क में उमड़-घुमड़ मचाते हैं, लेकिन अफ़सोस उनका जवाब नहीं मिलता. अगर किसी के पास किसी प्रश्न का उत्तर हो तो बताएं.

मुस्लिम आतंकवाद का राग अलापने वालों को हिन्दू आतंकवाद क्यों नहीं दिखता और हिन्दू आतंकवाद की बात करने वाले मुस्लिम आतंकवादियों पर चुप क्यों हो जाते हैं?

अफज़ल गुरु के लिए मानवाधिकार की दुहाई देने वाले, संसद हमले में शहीद पुलिसवालों की बात क्यों नहीं करते और उन पुलिस अधिकारियों के घरवालों के प्रति सहानुभूति रखने वालों को अफज़ल गुरु के घरवाले क्यों नहीं दिखाई देते?

गुजरात दंगों की बात करने वालों को सन चौरासी के दंगे या कश्मीरी पंडितों का अपनी ज़मीन-जायदाद छोड़कर रिफ्यूज़ी कैम्पों में रहना क्यों नहीं दिखता और कश्मीरी पंडितों के दर्द को महसूस करने वालों को गुजरात में सरेआम हुआ कत्लेआम क्यों नहीं दिखता?

नक्सली हिंसा में मरने वाले पुलिसवालों से सहानुभूति रखने वालों को पुलिसवालों द्वारा सोनी सोढी और ऐसे ही अन्य आदिवासियों पर किये गए अत्याचार क्यों नहीं दिखाई देते और सोनी सोढी के हक के लिए लड़ने वाले लोगों को नक्सलियों द्वारा बेरहमी से मार दिए गए पुलिसवालों से सहानुभूति क्यों नहीं होती?

कश्मीरियों के लिए आत्मनिर्णय का समर्थन करने वाले ये क्यों भूल जाते हैं कि पूर्वोत्तर के भी बहुत से राज्य भारतीय संघ में कई शर्तों के साथ सम्मिलित किये गए थे, उनके आत्मनिर्णय का क्या? अगर कश्मीर अलग होगा तो क्या पूर्वोत्तर में अलगाव की मांग नहीं उठेगी? तमिलनाडु जो शुरू से भारत के विरुद्ध जाकर श्रीलंका में सिंघलियों के विरुद्ध तमिल लोगों की हिंसा का समर्थन करता रहा उसका क्या?

मेरे सवालों की लिस्ट बहुत लंबी है…पर अभी बस यही सवाल! मैं न भाजपाई हूँ, न कांग्रेसी और न कम्युनिस्ट. मैं एक आम भारतीय नागरिक हूँ, जिसे हर पीड़ित का दुःख अपना दुःख लगता है, जो आतंकवाद की घटना या सामूहिक बलात्कार की घटना के बारे में सुनकर, गाना सुनना और खाना खाना भूल जाती है. बस सोचती रहती है कि जिनके घर के लोग मारे गए या शोषण का शिकार हुए, वो कैसे होंगे?

जानती हूँ कि ये अति संवेदनशीलता है लेकिन होते हैं कुछ लोग ऐसे भी. मुझे ये बात समझ में नहीं आती कि लोग आतंकवाद और मानवाधिकार के मामले में सेलेक्टिव कैसे हो सकते हैं?

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