हम उस दौर में जी रहे हैं जहाँ सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के लिए पर्यावरण नहीं, बल्कि युद्ध प्राथमिकता है. ग्लेशियर पिघल रहे हैं, हिमालय बर्फ विहीन हो रहा है और वैज्ञानिक चेतना की जगह अंधविश्वास और हथियारों की होड़ ने ले ली है. क्या हम वाकई ‘विश्वगुरु’ बनने की ओर बढ़ रहे हैं या सामूहिक विनाश की ओर?
ईरान में रह रहे एक व्यक्ति ने अपने देश की मौजूदा स्थिति संक्षेप में कुछ तरह बयां की है: “ईरान एक ऐसा राष्ट्र है जो अपने ही शासन द्वारा बंधक बना हुआ है, लेकिन अपने पड़ोसियों के हश्र से त्रस्त है. हम एक ऐसे घर में फंसे हुए हैं जिससे हम नफरत करते हैं, और चारों ओर ऐसी आग से घिरे हुए हैं जिससे हम और भी अधिक भयभीत होते हैं.”
आज दुनिया एक ऐसे मोड़ पर है जहां क्रूरता को ‘नीति’ बताकर जायज ठहराया जा रहा है. एक तरफ वो ताकतें हैं जो बमों से शांति लाना चाहती हैं, और दूसरी तरफ वह परंपरा जो मरकर भी हार न मानने का साहस देती है.
पटना के बाहर हाईवे किनारे मिले बच्चों से हुई एक छोटी-सी मुलाकात ने ज़िम्मेदारी, शिक्षा और संवेदनशीलता का बड़ा सबक़ दे दिया.