कृषि के निर्णय किसान ही क्यों नहीं लेते?

कृषि कार्यकर्ताओं ने सरकार से किसान प्रजनकों को पहचानने और उन्हें समर्थन देने की अपील की है. यह समय की मांग है क्योंकि हर जगह बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उनके बीजों को ही बढ़ावा दिया जा रहा है, जबकि वास्तव में अधिकांश किसान अपने स्वयं के बीज पसंद करते हैं.

यह कहते हुए कि बहुराष्ट्रीय और निजी कंपनियां भ्रम पैदा कर रही हैं एवं हमारे पारंपरिक खेती के तरीकों से छेड़-छाड़ कर रहे हैं, उन्होंने बताया, “हमारे किसानों को ऐसे बीज चाहिए होते हैं जो फसल की उन्नत किस्में पैदा करें, उनकी विशिष्ट जरूरतों को पूरा करें और पर्यावरण का भी ख्याल रखें. और यह सब कुछ सिर्फ एक किसान ही पूरा कर सकता है.”

बनारस के ऋषि प्रकाश सिंह रघुवंशी ने स्वयं किसानों द्वारा तैयार लोकप्रिय धान एवं गेहूं के बीजों का हवाला देते हुए कहा कि देसी बीज प्राकृतिक धरोहर एवं उपहार हैं. प्रकृति में प्राकृतिक तरीकों से ही बीज का उत्पादन होता है. अतः हमें परंपरागत बीजों से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए.

कर्णाटक के ‘सेव आवर राईस कैम्पेन’ के संयोजक शांता कुमार कहते हैं बीज तैयार करने वाले किसानों की पहचान अविलंब शुरू कर देनी चाहिए. उन्हें हर तरह का संरक्षण एवं समर्थन भी मिलना चाहिए.

‘जीएम फ्री बिहार मूवमेंट’ के उपेन्द्र नाथ वर्मा के अनुसार पूरे बीज उत्पादन और आपूर्ति व्यवस्था के निजीकरण और एकाधिकरण से हमारी बौद्धिक संपदा अधिकार प्रभावित हो रही है, जबकि किसानों द्वारा स्वयं तैयार किये गए बीज सहज कौशल के उदाहरण हैं. किसानों को सटीक लक्षण मालूम होते हैं जिनसे विभिन्न स्थितियों में उपयुक्त कृषि की जा सकती है.

ऐसी स्थिति में यह महत्वपूर्ण है कि एक बार फिर अपने किसानों की क्षमताओं को समझा जाए और उनके द्वारा तैयार किये गए किस्मों को समर्थन दिया जाए. “हमें नहीं भूलना चाहिए कि कृषि क्षेत्र में सारी उपलब्धियां किसानों द्वारा तैयार बीजों से ही मिली हैं.”