यूनिवर्सिटी कैंपस निशाने पर

हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी और जेएनयू के बाद ताज़ा-ताज़ा डीयू यानी दिल्ली यूनिवर्सिटी में देशभक्ति की आड़ में हिंसा का अखाड़ा खुला है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में हालिया छात्र हिंसा के बाद देशभर में एक बार फिर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और ‘राष्ट्रवाद’ पर नए सिरे से बहस छिड़ गई है.

हर शख्स किसी को राष्ट्रवादी तो किसी को देशद्रोही बताता दिख रहा है. आम से लेकर खास तक राष्ट्रवाद को नए सिरे से परिभाषित कर रहे हैं.

कुछ माननीय ऐसे भी हैं जिनकी नजरों में एक खास तबके को हिन्दुस्तान में रहने का हक नहीं, उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए.

यूनिवर्सिटी छात्रा गुरमेहर कौर

इस विवाद की शुरुआत रामजस कॉलेस में हुए एक कार्यक्रम से हुई जहां एक छात्र संगठन ने ‘देशद्रोह’ के आरोपी उमर खालिद को वक्ता बनाया था.

आरोप है कि कार्यक्रम स्थल पर दो छात्र संगठन के समर्थकों के बीच मारपीट हुई, जिसमें छात्र और शिक्षक दोनों ही घायल हुए.

इस हिंसा के खिलाफ यूनिवर्सिटी छात्रा गुरमेहर कौर ने सोशल साइट फेसबुक पर अपनी भड़ास निकाली.

गुरमेहर एक तख्ती पकड़ी हुई नजर आईं, जिसपर उन्होंने हिंसा के लिए एक छात्र संगठन को जिम्मेदार ठहराते हुए लिखा कि वह हर तरह की हिंसा की मुखालफत करती हैं.

यहां तक कि उन्होंने अपने शहीद पिता के बारे में लिखा कि उन्हें पाकिस्तान ने नहीं बल्कि ‘जंग’ ने मारा.

इसके बाद देशभर में गुरमेहर के समर्थन और विरोध में बयान आने लगे. कई लोगों ने गुरमेहर के खिलाफ बेहद अभद्र टिप्पणी की.

बात इतने से ही खत्म हो जाती तो कोई और बात थी. कुछ मंत्रियों ने भी गुरमेहर को ‘भटका’ हुआ करार दिया. वहीं गुरमेहर के समर्थन में भी बयान आए.

जो लोग अपनी बात हमेशा बेबाकी से रखने के लिए जाने जाते हैं उन्होंने गुरमेहर को एक बहादुर लड़की करार दिया.

कुछ यही हालात पिछले साल जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में देश-विरोधी नारों के बाद देखने को मिले थे.

तब भी राजनीतिक जमात के साथ ही आम आदमी दो भागों में बंट गया था. देशभर में तनावपूर्ण बहस होने लगी थी.

सवाल यह है कि आखिर बार-बार देश में राष्ट्रवाद पर बहस क्यों छिड़ रही है? क्यों किसी की राष्ट्रभक्ति पर प्रश्नचिह्न उठाया जा रहा है?

बहरहाल, एक बात तो स्पष्ट दिख रही है कि राष्ट्रवाद को कोई भी बिना जाने इसे जानने का दावा कर रहा है.

भारत बोल रहा है