पासपोर्ट ग्रीनकार्ड गुम

एक भारतीय लड़की अपने देश वापस आती है. पांच साल बाद, राजधानी दिल्ली के एयरपोर्ट से उतर कर तड़के सुबह जब अपने घर जाती है तो उसे साफ़ सुथरी सड़कें इम्प्रेस करती हैं.

बेहतर ट्रैफिक मैनेजमेंट और चौड़ी सड़कों की वजह से वह पहले से कम समय में ही घर पहुंच जाती है. फिर, दिन में वह कुछ मार्केटिंग करने का सोचती है. तब शुरू होती है उसकी त्रासदी.

दिल्ली के सरोजनी नगर मार्केट में शौपिंग करने के बाद वह घर लौटने के लिए ऑटो-रिक्शा लेती है. करीब चार बजे अपने घर फोन कर लड़की बताती है कि वह कुछ देर में पहुंचने वाली है.

लेकिन, रात दस बजे तक वह पुलिस थाने में ही बैठी रहती है, अपना एफ.आई.आर. लिखवाने के लिए. लगभग साढ़े-चार बजे बाइक पर सवार तीन लड़कों ने उसका पर्स जो लूट लिया.

दिन दहाड़े दिल्ली के पटपड़गंज और मयूर विहार इलाके के बीच से गुजरते नेशनल हाईवे संख्या नौ पर वारदात होती है, जिसमें गुंडे उस लड़की का पासपोर्ट, ग्रीन कार्ड, 600 अमेरिकी डॉलर, अमेरिकी ड्राइविंग लाइसेंस, कुछ हज़ार भारतीय मुद्रा, क्रेडिट-डेबिट कार्ड व दो मोबाइल फोन छीनकर भाग जाते हैं.

वे काली पल्सर बाइक पर सवार बदमाश इतनी बेरहमी से हमला करते हैं कि लड़की की जान बची है, यही गनीमत है. ऑटो-रिक्शा वाले के अनुसार वे उसे चलती ऑटो से बाहर ही खींचकर गिरा देते.

किसी राहगीर की मदद से वह पुलिस हेल्प लाइन 100 नंबर पर फोन करती है तो 20 मिनट में तीन तरफ से पुलिस मदद के लिए आ जाती है. लेकिन फरार बदमाशों को कौन पकड़े?

सड़क पर जानकारी इकठ्ठा करते हुए मदद के लिए आई पुलिस कई थानों को सूचना देती है, जिसके बाद उस लड़की को घटना वाले क्षेत्र से संबंधित थाने में औपचारिक शिकायत करने के लिए कहा जाता है. तब शाम के सवा पांच बज रहे होते हैं.

सूचना मिलते ही उसके घर के लोग तब तक उसके पास आ जाते हैं. वे सभी दिल्ली के पांडव नगर थाने में पुलिस को सारी जानकारी देते हैं, जिसके बाद एक शिकायत दर्ज होती है.

पुलिस रिपोर्ट यानी एफ.आई.आर. दर्ज होते-होते एवं उसकी कॉपी उन्हें मिलते-मिलते रात के साढ़े दस बज जाते हैं. लड़की बिलखती रहती है, विनती करती रहती है कि कम-से-कम उसका पासपोर्ट और ग्रीन कार्ड तो कोई वापस दिला दे.

कुछ ही दिन में उसे अमेरिका लौटना है जहां वह एक आईटी कंपनी में काम करती है. इस बार वह अपने माता-पिता से मिलने आई थी. कुछ दिन भारत में अपने दोस्तों-रिश्तेदारों के साथ बिताने आई थी.

चोर बदमाश लुटेरों ने उसकी भारत यात्रा पर ऐसा हाथ फेरा कि अब उसे पता नहीं कि उसके बाक़ी के दिन अपने देश में कैसे कटेंगे. एफ.आई.आर. नंबर 71/19 अब उसे खूब भारत भ्रमण करवाएगा.

वह पुलिस थाने के चक्कर लगाएगी, अमेरिकी एम्बेसी दौड़ती रहेगी, पासपोर्ट ऑफिस से संपर्क साधती रहेगी, और खुद को यह कह-कहकर दोषी ठहराती रहेगी कि, मैं भारत क्यों आई?      

भारत बोल रहा है