मलेरिया अभी खत्म नहीं हुआ है

दुनिया के कितने सारे लोग बीमारीयों के बारे कितना कुछ जानते हैं लेकिन बीमारीयां कैसे फैलती हैं और कैसे महामारी बन जाती हैं, उनकी भनक तक नहीं लग पाती. जब तक पता चलता है तब तक  लाखों जानें चली जाती हैं.

सोनिया साह की ‘पेनडेमिक’ में है जानकारी

बीमारीयां कैसे महामारी बन जाती हैं यह सोनिया साह की किताब पेनडेमिक में विस्तार से और वैज्ञानिक नजरिये से बताया गया है. किताब में कोलरा, मलेरिया, प्लेग, चिकनपॉक्स से लेकर ताजातरीन महामारी इबोला और जीका तक की ट्रैकिंग की गई है.

अमेरिकन साइंस जर्नलिस्ट सोनिया बताती हैं कि मानव की एक छोटी सी गलती उसकी समस्त जैविक क्रियाओं को बदल देती है और जो माइक्रोब्स हानि नहीं पहुंचाते हैं वो भी बाद में जाकर वैश्विक बीमारी बनकर इंसानों की ज़िन्दगी लीलने लगते हैं. संक्रमण है ही ऐसी बला, यह किसी को नहीं बख्शता.

Pandemicविकासशील देशों में महामारी भयावह

विकासशील देशों में खासकर अफ्रीका, भारत, लैटिन अमेरिका समेत तीसरी दुनिया के मुल्कों में जहां निकृष्टतम गरीबी है, हजारों एकड़ में फैली झुग्गियां हैं. वहां छोटी सी छोटी बीमारी गंदगी के कारण महामारी बन जाती है.

19वीं सदी में मलेरिया ने लंदन, न्यूयार्क और पेरिस तक को आतंकित कर दिया था. मगर 21वीं सदी तक हम मलेरिया को खत्म नहीं कर सके हैं. मलेरिया और कोलरा ने कैसे बिहार के काला पानी कहे जाने वाले पूर्णिया-कटिहार में लाखों लोगों की जानें ली थी, इसका मार्मिक चित्रण रेणु के चर्चित उपन्यास ‘मैला आंचल’ में किया गया है.

हिन्दी साहित्य के जाने-माने आंचलिक उपन्यासकार ‘फणीश्वर नाथ रेणु’ की कृति मैला आंचल में मलेरिया और कोलरा जैसी महामारी का भयावह चित्रण पाठकों को मिलता है.

अफ्रीका में इबोला ने बरपाया कहर

सोनिया की किताब पेनडेमिक में महामारी इबोला के बारे में बताया गया है कि यह बीमारी अफ्रीका के जंगलों में चमगादड़ों के जरिये आई और फिर जानवरों से होते हुए मानवों तक पहुंच गई.

H5N1 जिसे हम बर्ड फ्लू कहते हैं, यह जितने लोगों को संक्रमित करती है उसमें से निश्चित रुप से आधे लोगों की जानें चली जाती हैं.

सोनिया ने किताब लिखने के दौरान रिसर्च में यह पाया कि चीन के पॉल्ट्री फार्म में किस तरह माइक्रोब्स आपस में म्यूटेट कर विस्तारित होते हैं और फिर इंसानों को अपना शिकार बनाते हैं.

सरकारी नीतियों से फैलती महामारी

इस किताब में शासन और सरकार की नीतियों को भी महामारी के फैलने के लिए आरोपी बनाया गया है. कहा गया है कि विकासशील देशों की तो बात छोड़िए, विकसित देशों ने महामारी से लड़ने के लिए अभी तक कोई प्रभावशाली सर्विलांस सिस्टम विकसित नहीं किया है.