फिल्म समीक्षा: जुनून

प्रेम, सनक, युद्ध और मौत की कहानी है जुनून.

रस्किन बांड के नॉवेल – ए फ्लाइट ऑफ पिजन्स पर आधारित श्याम बेनेगल की फिल्म जुनून का बैकड्रॉप 1857 की गदर क्रांति थी. यह फिल्म प्रेम, सनक, पागलपन, कट्टर राष्ट्रवाद और मौत से रू-ब-रू कराने वाली एक डरावनी कहानी दर्शाती है. फिल्म में युद्द की क्रूरता के साथ-साथ आजादी पूर्व के कालखंड की सामाजिक-राजनीतिक और नैतिक आदर्शों की पड़ताल भी पर्दे पर पात्रों के जरिये कही जाती है.

जुनून फिल्म को जब हम रिवाइंड करेंगे तो सबसे पहले शशि कपूर का वह सामंती चेहरा ही उभर कर सामने आएगा जिसकी सबसे ज्यादा चर्चा फिल्म समीक्षकों ने की है. फिल्म में जेनिफर केंडल, नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी और नफीसा अली ने भी अपने-अपने किरदार के साथ भरपूर इंसाफ किया है.

वनराज भाटिया का मार्मिक संगीत फिल्म की जान है और गोविंद निहलानी की सिनेमेटोग्राफी तो दर्शकों को उस कालखंड का हिस्सा ही बना देती है. काफी हद तक उन्होंने दृश्यबंध के जरिये इतिहास की वास्तविकता बताने की कोशिश की है.

एक गोरी मेम से जुनून के हद तक इश्क करने वाला सामंत जावेद खान की भूमिका में शशि कपूर की एक्टिंग असधारण है. पूरी फिल्म में उनकी एक्टिंग एक सनकी प्रेमी और एक विवेकशील इंसान के बीच झूलती रहती है. इस चुनौतीपूर्ण एक्टिंग को शशि कपूर जैसे समर्थ एक्टर ही निभा सकते थे.

–मुर्तज़ा अली खान

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