फिल्म समीक्षा: कल आज और कल

एक पर्दे पर पृथ्वीराज कपूर, राज कपूर, रणधीर कपूर की तिकड़ी और उसके साथ किशोर कुमार-आशा भोंसले के स्वरों से पिरोया हुआ शंकर जयकिशन का संगीत. 1971 में  रणधीर कपूर द्वारा निर्मित ‘कल आज और कल’ का शायद ही कोई इतना संक्षिप्त और अदभुत वर्णन हो.

कपूर तिकड़ी और बबिता कपूर अभिनीत ये सिनेमा कहानी है कपूर खानदान के तीन पीढ़ी के अलग विचारधारा की. राम बहादुर कपूर (राज कपूर) मुंबई के एक बहुत मशहूर व्यवसायी हैं जिनका बेटा राजेश (रणधीर कपूर) विदेश में पढ़ाई करने गया है और पिता दीवान बहादुर कपूर (पृथ्वीराज कपूर) गांव में रहते हैं.

विदेश से आने के बाद पिता को अकेला पाकर राजेश अपने दादा को झूठा तार भेज कर मुंबई बुला लेता है और फिर आता है कहानी में मज़ा. वीरेंदर सिन्हा द्वारा लिखित ये कहानी है दादा पोते के वैचारिक भिन्नता की. ग्रामीण परिवेश में रहने वाले दीवान बहादुर कपूर जहां आज भी पौराणिक रूढ़िवादी सोच रखते हैं वहीं राजेश की सोंच नए जमाने की है.

जहां दादा आज भी शादी को अटूट बंधन मानते हैं वहीं पोता तलाक को सही मानता है. जहां दादा जात-पात में विश्वास करते हैं वहीं पोता छूत-अछूत को एक रूढ़िवादी सोच मानता है. राजेश सुबह-सुबह जहां हिप-हॉप सुनता है वहीं दीवान बहादुर सुबह-सुबह राम का जाप करते हैं.

राम बहादुर अपने पिता और बेटे की बीच में हुई लड़ाई को सुलझाने के लिए घर से गायब हो जाते हैं और दोनों को सबक सिखाने के लिए शराबी और अय्याश बनने का नाटक करते हैं, जिसे देखकर राजेश और दीवान एकजुट होने का ढोंग करते हैं. पिता और बेटे को साथ देखकर राम बहादुर ख़ुशी मनाने के लिए पार्टी का आयोजन करते हैं पर दादा-पोते का ढोंग तब खत्म हो जाता है जब दीवान बहादुर अपने पोते की मर्ज़ी के विरुद्ध उसकी शादी रुक्मणी से करने की घोषणा दावत में कर देते हैं.

यह देखकर राम कपूर क्या करेंगे? क्या राजेश अपने प्यार मोना को त्याग कर रुक्मणी से शादी करेगा? यह जानने के लिए ज़रूर देखें ‘कल आज और कल’. राज कपूर द्वारा निर्देशित इस सिनेमा में ‘आप यहां आए किस लिए’, ‘भवरें की गुंजन है मेरा दिल’, जैसे सदाबहार गीतों में मोनिका (बबिता) और राजेश (रणधीर) का प्रेम बहुत खूब दर्शाया गया है.

इस फिल्म में जहां पृथ्वीराज कपूर के संवाद आपका मन मोह लेंगे वहीं बबिता के स्वयं परिकल्पित परिधान आपको आकर्षित करेंगे. पृथ्वीराज कपूर के आखिरी सिनेमा में से एक का यह संवाद आज भी लोगों को याद है, ‘जो आज नया है, कल पुराना हो जाएगा … जो आज पुराना है, कल नया बनकर सामने आएगा’, और शायद ये ही इस सिनेमा का सारांश है.

भारत बोल रहा है