पुलिस हरकत से अलीगढ़ में बच्ची की हत्या रोकी जा सकती थी

ज्यादातर बच्चों के गुम होने पर मां-बाप जब पुलिस थाने जाते हैं तो उनकी शिकायत दर्ज करने के बजाए उन्हें कहा जाता है कि बच्चा आसपास ही होगा और ढूंढने की कोशिश करें तो मिल जाएगा. और, जब तक मां-बाप की बात मानकर 10-15 दिन में शिकायत दर्ज की जाती है, बच्चा कहीं का कहीं पहुंच चुका होता है, फिर उसे ढूंढना बहुत मुश्किल हो जाता है.

हाल की एक घटना देखें तो अलीगढ़ के पास एक ढाई साल की बच्ची की हत्या कर उसके क्षत-विक्षत शव को कूड़े में फेंक दिया गया जबकि उसके माता-पिता अपनी गुमशुदा बच्ची की रिपोर्ट लिखाने के लिए पुलिस थाने में गुहार लगाते रहे. अगर समय रहते पुलिस व प्रशासन हरकत में आया होता तो बच्ची को बरामद किया जा सकता था, और एक नन्हीं जान को बचाया जा सकता था.

अलीगढ़ के ही आला पुलिस अधिकारी के मुताबिक बच्ची के अपहरण के बाद उसकी बरामदगी के लिए सार्थक प्रयास नहीं किए गए. अभियुक्तों का पता लगाने के बाद भी उनकी गिरफ्तारी का भी प्रयास नहीं किया गया. इस अलोक में अलीगढ़ एक दर्दनाक कहानी का सिर्फ गवाह बना दिख रहा है.  

आला पुलिस अधिकारी के मुताबिक बच्ची के अपहरण के बाद उसकी बरामदगी के लिए सार्थक प्रयास नहीं किए गए.

दैनिक समाचार पत्र जनसत्ता में प्रकाशित एक संपादकीय के मुताबिक देश में कानून-व्यवस्था और सुरक्षा के मद में सरकारें अकूत धन राशि खर्च करती हैं और गुमशुदा बच्चों के मसले पर औपचारिकताएं ही करती नज़र आती हैं.

संसद में भी कई बार गुमशुदा बच्चों के मामले में आंकड़े पेश किए जाते रहे हैं जिमसें लाखों बच्चों के लापता होने की पुष्टि होती रही है. इसके बावजूद सरकार या इसका कोई भी तंत्र इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है? 

कुछ बच्चों को पुलिस जैसे-तैसे खोज लेती है, मगर बाकी का कोई अता-पता नहीं चलता. जो नहीं मिलते, वे कहां जाते हैं‌? किसके शिकंजे में फंस जाते हैं? क्या वे सिर्फ सवाल बनकर रह जाते हैं. एक सच यह भी है कि बाल तस्करी में लगे माफिया गरीब लोगों की बस्तीयों पर नज़र रखते हैं और वहां से बच्चे चुराते हैं.

पुलिस अफसरों के मुताबिक हाल के दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से कुछ रोचक केस सामने आए, जिसमें बच्चे लापता कहीं से हुए और कई साल बाद मिले कहीं और से. लंबे समय तक लापता होने पर जब ये बच्चे बड़े हो जाते हैं तो रहन सहन की वजह से हुलिया भी बदल जाता है और तब असली माता-पिता का भी पता नहीं चल पाता.

बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अनुसार बाल श्रम, अंग तस्करी और वेश्यावृति के लिए बच्चों को चोरी किया जाता है. वैसे तो यह आयोग कई दावे करता है, लेकिन सच्चाई यही है कि आयोग भी आज बेबस नज़र आता है.

हमारे देश में पुलिस को गुमशुदा बच्चों की तलाश के लिए ना तो संवेदनशील बनाया गया है और ना ही उसे वो साधन दिए गए हैं जिनसे वो बच्चों की तलाश को अपनी प्राथमिकता बनाए.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की ही एक रिपोर्ट कहती है कि 80 प्रतिशत पुलिस वाले गायब होने वाले बच्चों की तलाश में कोई रुचि नही दिखाते.

क्यों लापता होते हैं बच्चे

शायद प्रत्येक माता के जीवन में ऐसा एक समय आया होगा जब उनका बच्चा लापता प्रतीत हुआ हो. बच्चे का शायद स्कूल से घर आने में, खेलकर या दुकान से आने में देर हो गई हो. जैसे समय निकलता जाता है, माता अपने बच्चे की सुरक्षा के प्रति उन्मत होती है और खोजना भी आरंभ कर देती है. साधारणतः जब वह घुमक्कड़ बच्चा कुशल घर लौटता है तब कहीं चैन की सांस ली जाती है.

परंतु बच्चों की एक बढ़ती हुई संख्या घर नहीं लौटती, वे अचानक दृष्टी से ओझल हो जाते हैं. कितने? वास्तव में यह कोई नहीं जानता. यूनीसेफ यानी यूनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रेन्स फंड में सलाहकार लियो गोल्डस्टोन कहते हैं, “दुर्भाग्यवश, हमारे पास ऐसे आंकड़े नहीं है. अंतरराष्ट्रीय रूप से हम यह जमा नहीं करते.” शायद ऐसा इसलिए है कि अधिकांश घटनाएं केवल एक स्थानीय समस्या के रूप में देखी गई हैं. सुनिश्‍चित राष्ट्रीय आंकड़े भी नहीं है.

अमेरिका की एक सीनेटर पौला हॉकिन्स कहती हैं, “कोई यह भी नहीं जानता कि प्रत्येक वर्ष कितने बच्चे गायब होते हैं. परंतु हम जानते हैं कि यह एक ऐसी समस्या है जिसकी हम अवहेलना नहीं कर सकते.”

भारत बोल रहा है