कुपोषण के शिकार

संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएन) के मुताबिक विश्व में करीब 159 लाख बच्चे लंबे समय से कुपोषण के शिकार हैं. ‘असमान वितरण, प्रत्येक बच्चे में कुपोषण का अंत’ शीर्षक से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2030 तक कुपोषण निवारण हेतु निरंतर कार्य करने के बावजूद आंकड़े दर्शाते हैं कि 129 लाख बच्चे, जिनकी उम्र पांच वर्ष से कम हैं, विश्व में कुपोषण का शिकार बने रहेंगे.

कुपोषण एक ऐसी बीमारी है जिसने देश के भविष्य को ही कमजोर कर दिया है. भारत में आज भी कई इलाके हैं जहां कुपोषित बच्चों की कमी नहीं है. ऐसे देश का भविष्य क्या होगा जो कुपोषित हो. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भारत में हर साल कुपोषण के कारण मरने वाले पांच साल से कम उम्र वाले बच्चों की संख्या दस लाख से भी ज्यादा है. दक्षिण एशिया में भारत कुपोषण के मामले में सबसे बुरी हालत में है.

कुपोषण के मुख्य कारणों की चर्चा करते हुए यूएन सलाहकार सामोना सेराभेसी कहती हैं कि बहुत सारे देशों में कुपोषण का संबंध गरीबी, न्यूनतम सफाई और स्वास्थ्य की स्थिति, शिक्षा की कमी और यहां तक की स्थानीय समुदायों में असमानताओं के कारण है. गृह-युद्ध और प्राकृतिक आपदा के कारण भी बच्चों को कुपोषण का शिकार होना पड़ता है.

सर्वप्रथम हमें कुपोषण के मुख्य कारणों को जानने और इसका विश्लेषण करने की जरूरत है, जिससे विभिन्न देशों में इसके कारणों का पता लगाया जा सके. सरकारों को गंभीरता पूर्वक इस मुद्दे पर कार्य करने की जरूरत है. हम दृढ़ता से विश्वास करते हैं कि कुपोषण से निपटने हेतु हमारी प्रतिबद्धता एक नैतिक और कानूनी अनिवार्यता के साथ शुरू होनी चाहिए जिससे भोजन और पोषण का अधिकार सभी लोगों को मिल सके.

भारत में भी यह दुर्भाग्यपूर्ण कोशिश होती रहती है कि कैसे गरीबों की संख्या व कुपोषण के शिकार बच्चों के आंकड़े को कम बताया जाए. ऐसा करने के पीछे मकसद यह होता है कि कम से कम लोगों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का फायदा मिले. हम प्रत्येक का उत्तरदायित्व है कि कुपोषण का अंत करने में अपनी भूमिका निभाएं. यह असंभव कार्य नहीं है बशर्ते कि इसके निवारण हेतु प्रयास शुरू किए जाएं. कन्या शिशु के प्रति समाज के नजरिए में परिवर्तनकारी बदलाव लाने के लिए आप क्या कर रहे हैं?

भारत बोल रहा है