कितना सच्चा है साल 2018 का यह मीटू अभियान

मीटू ने महिलाओं को एक ऐसा सच उजागर करने की हिम्मत दी है जिससे दुनियाभर में पितृसत्ता को चुनौती मिली है.

कह सकते हैं, उस समय चुप रहना एक निर्णय था. हां, क्यों नहीं? यौन उत्पीड़न पर चुप्पी साधना हमारे ‘कल्चर ऑफ साइलेंस’ (समाज का शोषण की तरफ मौन) के बारे में बताता है.

वहीं उस उत्पीड़न को कई सालों बाद उजागर करना ‘कल्चर ऑफ साइलेंस’ की उलट धारा है.

गौर करने की बात यह है कि, ना चुप्पी साधना आसान है और ना ही घुटन व ख़ामोशी की दीवार गिराना.

मौन की आवाज़ में आप कई सालों तक घुटते हैं, और जब आप आवाज़ उठाते हैं तो उसके परिणाम सालों बाद भी उतने ही डरावने लगते हैं जिनकी वजह से कभी आपने खामोश रहने का निर्णय लिया था

हैशटैग लगे #मीटू अभियान में ऐसे तर्क भी सुनने को मिले हैं कि औरतों ने बदला निकालने के मकसद से या प्रचार लोलुपता के कारण शरीफ आदमियों पर झूठे इलज़ाम लगाए.

इससे यह मतलब तो निकाला जा ही सकता है कि #मीटू का असुविधाजनक सच जो चार आंखों तक ही सीमित था, उसने आज समाज को हज़ारों आंखें दे दी हैं.

यौन उत्पीड़न का वजूद घर, ऑफिस, होटल, हॉस्पिटल, यूनिवर्सिटी, बॉलीवुड, हॉलीवुड, राजनीति हर जगह है, और उत्पीड़क कोई ब्रांडेड असामाजिक अपराधी नहीं बल्कि अपने क्षेत्र में सफल और इज़्ज़तदार चेहरे हैं.

सोशल मीडिया के वजूद ने #मीटू को उसकी जगह दी, भले ही यह अभियान भारत में देर से फैला, पर इसने कई हस्तियों के मुखौटे उखाड़ फेंके हैं. और जब-जब नए उद्घाटन हुए, सार्वजनिक शर्मिंदगी हुई है.

‘संस्कारी’ बापू अलोकनाथ, दमदार एक्टर नाना पाटेकर, पूर्व संपादक एवं केंद्रीय मंत्री एम.जे अकबर, फ़िल्मकार सुभाष घई जैसे लोगों के नाम उछलने से तो ऐसा लगता है कि विश्व को सबसे ज़्यादा #मीटू देकर, भारत ने अमेरिका से बढ़त हासिल कर ली.

आए दिन ये सवाल भी उठता है कि जब वाकया हुआ, तब आवाज़ क्यों नहीं उठाई गई. सवाल करने वाले यह नहीं समझते कि पितृसत्ता के नशे में चूर उत्पीड़क की ताकत और पीड़ित की चुप्पी का गहरा रिश्ता होता है.

यौन उत्पीड़न पर मौन रखना या उसे उजागर करना किसी भी पीड़ित के लिए ‘आगे कुआं पीछे खाई’ से कम नहीं होता.

मीटू कैंपेन के तहत जाने-माने हॉलिवुड प्रड्यूसर हार्वी वाइंस्टाइन पर जब आरोपों का दौर जारी हुआ था, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह भारत में भी सामने आएगा

आज #मीटू ने ‘कल्चर ऑफ साइलेंस’ को ललकारा है. इस अभियान ने यौन उत्पीड़न की कठोर सच्चाई को भी सामने किया है.

दर्जनों महिलाओं ने एम.जे. अकबर पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं. पर एम.जे. अकबर ने आरोप लगाने वालों में से एक प्रिया रमानी पर मानहानि का मुकदमा ठोक दिया है.

बहरहाल, पुरुषों में इस #मीटू अभियान ने एक डर पैदा कर दिया है. वे सोचने-टटोलने पर मजबूर हैं कि क्या सोशल मीडिया पर अगला नाम उनका हो सकता है?

सही भी है, क्योंकि शायद पहली बार कई पुरुष सोच रहे हैं कि चुप्पी का मतलब सहमति नहीं.

#मीटू का मकसद है समाज में दबे हुए यौन उत्पीड़न के कई राज़ को आवाज़ देना.

उनके लिए ये जीत-हार की लड़ाई नहीं, उनके लिए ये अपने ऊपर हुए अत्याचार को आवाज़ देकर, कई और अत्याचारों को होने से रोकने की कोशिश है.

प्रिया रमानी और उनके जैसी अनेक महिलाओं की जीत उसी दिन हो गई जब उन्होंने अपनी चुप्पी तोड़कर अपने साथ हुए घिनौने यौन उत्पीड़न को उजागर किया.

इन हज़ारों ‌#मीटू की सच्चाई से एम. जे. अकबर जैसे पुरुषों की भीड़ अदालत में लड़ तो सकती है पर नैतिकता के कटघरे में जीत नहीं सकती.

बहरहाल, मौजूदा #मीटू अभियान इतिहास का वो पल है जिसने शोषित औरतों को शर्म के दायरे से निकालकर हिम्मत से खड़े होने की आज़ादी दी है.

इन सभी महिलाओं के निर्णय को आने वाली पीढ़ियां याद रखे या न रखें पर इसकी गूंज कई उत्पीड़कों को डरा रही है.

इसमें कोई शक नहीं कि महिलाओं की हिम्मत ने पितृसत्ता की जड़ों को फिर से हिला दिया है.

आप भी अपनी चुप्पी तोड़िए और एक दूसरे की हिम्मत बनिए, जिससे कि अगली बार कोई भी व्यक्ति यौन उत्पीड़न करने से पहले सौ बार सोचे और फिर दु:साहस नहीं कर पाए.