जब पिता दोस्त जैसे हों !

मेरे पिताजी और मेरे बीच आयु का फासला लगभग 42 साल का था. कहते हैं एक पीढ़ी के बाद पीढ़ी अंतराल घट जाता है. इसलिए हमलोग दोस्त ज़्यादा थे, पिता-पुत्री कम. मैं उनसे ‘तुम’ करके बात करती थी और बराबर लड़ाई और बहस करती रहती थी.

पिताजी की सेवानिवृत्ति के बाद जब हम गांव (गह्जी कलवारिया, आजमगढ़) शिफ्ट हुए, तो हमारा सामना अजीब-अजीब बातों से होने लगा. गांव के लोगों को हमारी जीवनशैली तो अलग लगती ही थी, साथ ही ये बात बड़ी खराब लगती थी कि हमलोग पिताजी से तुम कहकर बात क्यों करते हैं?

ऐसा तब था जबकि भोजपुरी में सारे भाई लोग अपने-अपने पिता को ‘तूं’ ही कहकर संबोधित करते थे. शायद उन्हें खड़ी बोली में बोला गया ‘तुम’ शब्द अपरिचित लगता हो. पहले तो ये बातें हमारे पीठ पीछे होती थीं. फिर एक दिन एक चाचा ने मुझसे सीधे पूछ लिया – “आप अपने पिताजी को ‘तुम’ क्यों कहती हैं? क्या आप उनका आदर नहीं करतीं?”

मन में तो आया कह दूं कि “जब बाऊ को नहीं समस्या तो आपको क्या लेना-देना?” लेकिन समझती थी कि ये उन्नाव की रेलवे कालोनी नहीं है गांव है. मैंने कहा,”चाचा जी, मैं अपने बाऊ का आदर नहीं करती, प्यार करती हूँ.” मैंने बाऊ की ओर देखा तो वो मुस्कुरा रहे थे. हमेशा की तरह.

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