कब तक अन्याय देखते रहेंगे?

समृद्ध समाज के लिए आदर्श सिद्धांत एवं तर्कसंगत विधि विधान की आवश्यकता होती है. हर तरह से परिपूर्ण समाज ही विकसित राष्ट्र की कल्पना का बोध कराता है.

भारत सभ्यता की विकास स्थली रहा है. सिंधु घाटी की सभ्यता ने सम्पूर्ण विश्व पर अपनी छाप छोड़ी. परंतु आज सभ्यता एवं संस्कृति की जन्भूमि भारत स्वयं आदर्श समाज एवं बेहतर विधि व्यवस्था के लिए लालायित दिख रहा है.

देश की राजधानी दिल्ली में खुलेआम चलती बस में सामूहिक बलात्कार की घटना से सम्पूर्ण राष्ट्र उद्वेलित तो हुआ लेकिन क्या शील हरण की घटनाएं रुक गईं?

स्थिति तो अब अत्यधिक गंभीर, निंदनीय एवं भयावह लगती है. बुलंदशहर की घटना इसका हालिया उदाहरण है. जब चप्पे-चप्पे पर फैले सुरक्षा तंत्र से लैस दिल्ली और उसके आस पास के क्षेत्रों की यह दशा है तो बाकी देश में आलम क्या होगा?

सदियों से पुरुष-प्रधान भारत में पुरुष मानव-तन में तो दिखते जरूर हैं लेकिन मानवीय आचरण एवं व्यवहार उनमें दिखाई नहीं देता. सेक्स के मामले में जानवरों का भी निर्धारित समय एवं अपना तौर तरीका है. परंतु, यहां मर्दों का कोई माप दंड नहीं है. अजीब विडंबना है.

देश के विभिन्न भागों में औरतों को बच्चा पैदा करने की मशीन और दिल बहलाने का साधन समझा जाता है. क्या आप कई बार मूकदर्शक नहीं बने रहे जब एक महिला को बच्चे से बूढ़े तक सभी ने आंखें फाड़-फाड़ कर देखा?

जब महिलाएं राष्ट्र निर्माण हेतु रोज़गार की तलाश में निकलती हैं तो इन्हें फिल्मिस्तान में कास्टिंग काऊच से गुजरना पड़ता है. निजी कंपनियों के मालिक एवं अधिकारियों के हवस का शिकार बनना पड़ता है.

एक पीड़ित महिला जब थाने में प्राथमिकी दर्ज करने जाती है तो पुलिसिया बदसलूकी, न्यायालय में वकीलों की अमर्यादित जिरह और जिस समाज की पीड़िता है उस समाज का मिजाज एवं भद्दा मखौल महिला को बहुत कुछ सोचने पर विवश कर देता है.

महिला घूंघट वाली हो, नकाब वाली हो या अर्धनग्न, वह तो मजबूर है. किसी भी लिबास में वह घूरी जा रही है. अगर यह कहा जाए कि उन्हें पूर्णतः मानवाधिकार मिला ही नहीं है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. आज पूरे विश्व में बोलने, सोचने, रहने सहने, शादी ब्याह एवं अन्य मामलों की आजादी पर बहस चल रही है.

लोग यह भी कह रहे हैं कि खुद सेना, अर्धसैनिक बल और पुलिस से महिलाएं महफूज़ नहीं हैं. महिलाओं के साथ बदसलूकी और अत्याचार आम हो गया है. देश के किसी भी कोने में इनकी इज्ज़त सुरक्षित नहीं है.

स्थिति बदल सकती है अगर समानता लाने का प्रयास हम सब करें. औरतों की स्थिति पर गंभीरता से सिर्फ विचार नहीं बल्कि कदम उठाने होंगे. बेहतर समाज बनाना होगा. इस दिशा में सच्ची पहल करनी होगी. अपने घरों में लड़के-लड़कियों में भेद-भाव भी समाप्त करने होंगे.

भारत बोल रहा है