थेलेसीमिया की बीमारी का क्या इलाज है?

निधि, प्रतिभा और जिम्मी में कौन सी चीज सामान है? ये सभी बच्चे चार से 12 वर्ष की उम्र के हैं. इन्होंने न तो किसी परीक्षा में टॉप किया है और न ही कोई और कारनामा अंजाम दिया है. दरअसल ये चारों बच्चे उन लाखों में से हैं, जिन्हें थेलेसीमिया की नामुराद बीमारी है और ये चरों भी इस कटु सत्य से वाकिफ है कि अगर वे इस दुनिया में नहीं आते तो बेहतर होता.

थेलेसीमिया खून का एक आनुवांशिक रोग है. इससे पीड़ित व्यक्ति के शरीर में पर्याप्त मात्रा में हेमोग्लोबिन नहीं बनता और उनके शरीर में लाल रक्त कण भी सामान्य व्यक्ति की तुलना में कम समय तक जीवित रहता है, जिसके कारण इनमें रक्त की भारी कमी हो जाती है. इस रोग के रोगियों को अन्य प्रकार के इलाज तो करवाने ही पड़ते हैं साथ ही हर तीसरे-चौथे सप्ताह शरीर का रक्त भी बदलवाना पड़ता है. इस जतन के बाद भी इन पर मौत का साया लगातार मंडराता है.

हेमोग्लोबिन सम्बन्धी परेशानियों के अलावा इन्हें रक्त की और भी कई बीमारियों से जूझना पड़ता है. बार-बार रक्त बदलने से कई बीमारियों के वाइरस इनके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं. वाइरल हैपेटाइटीस ख़ास तौर से हैपेटाइटीस-सी की बीमारी रक्त बदलने से हो जाती है और इस तरह के 20 प्रतिशत रोगियों में यह बीमारी देखी जाती है. अफ्रीका, एशिया, भूमध्य क्षेत्र अथवा पश्चिम एशिया के लोगो में थेलेसीमिया की बीमारी आम है. यह दरअसल रक्त की ऐसी बीमारी है जो बालों और आंखों के रंग या त्वचा के रंग की तरह ही बच्चों को मां-बाप से विरासत में मिलती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के अनुसार विश्व के तीस करोड़ लोगों में इस बीमारी के जीन मौजूद है, जिनमें तीन करोड़ लोग अकेले भारत में है. ऐसा भी नहीं है की बीमारी के जीन होने पर बीमारी होना लाजिमी है. थेलेसीमिया दो तरह का होता है, माइनर और मेजर. मेजर थेलेसीमिया ही घातक आनुवांशिक अनेमिया है और जान लेवा है. देश के करीब एक लाख बच्चे थेलेसीमिया मेजर से पीड़ित हैं. जन्म के समय ये बच्चे पूरी तरह से सामान्य होते हैं, लेकिन उसके बाद तीन से 18 महीने की उम्र में इनमें रक्ततालपा दिखाई देने लगती है. बच्चों में बीमारी के लक्षण उभरने लगते हैं. ये बच्चे पीले और थके थके दिखाई देते है, इन्हें ठीक से नींद नहीं आती, कुछ खाना नहीं चाहते, और जोर जबरदस्ती कुछ खिलाया जाए तो उल्टी कर देते हैं. अगर इनका सही इलाज वक़्त पर नहीं कराया जाए तो ऐसे बच्चे एक से आठ वर्ष की उम्र तक पहुंचते पहुंचते दम तोड़ देते हैं.

अफ़सोस की बात ये है कि देश में ऐसे रोगियों कि तादाद में हर वर्ष दस हज़ार रोगी और जुड़ जाते हैं और चिकित्सा जगत के तमाम अजूबों और कारनामों के बावजूद इस बीमारी पर आज तक कारगर ढंग से काबू नही पाया जा सका है. रोगी को जीवित रखने के लिए उसे ज़रूरी दवाई दी जाती है और नियमित अन्तराल पर रक्त बदलवाया जाता है, लेकिन ज्यादातर मामलों में मौत को टाला  नही जा सकता. चिकित्सा जगत के पास इस रोग से बचाव या इसके संपूर्ण इलाज का कोई तरीका नही है.

जीवन भर रक्त बदलने और लव तत्व निकालने के अलावा एक और तरीके से भी इस बीमारी के रोगी को कुछ समय तक जीवित रखा जा सकता है. इस इलाज को ‘बोन मैरो ट्रांसप्लानटेशन’ कहा जाता है और इससे बीमारी को कुछ हद तक थामा जा सकता है. अगर यह इलाज सफल रहे तो थेलेसीमिया के रोगी को रक्त नहीं बदलवाना पड़ता और खुस्किस्मती से बोन मैरो ट्रांसप्लानटेशन की सुविधा भारत में ही उपलब्ध है. पहले यह सुविधा इटली, ब्रिटेन, अमेरिका और कुछ अन्य स्थानों पर ही उपलब्ध थी.

इस तरह के आपरेशन में स्वस्थ व्यक्ति की अस्थि मज्जा निकालकर रोगी में डाल दी जाती है, लेकिन इससे पहले बहुत से बातों का मिलान करना पड़ता है और आमतौर पर घर परिवार के व्यक्ति की अस्थि मज्जा ही रोगी की अस्थि मज्जा और अन्य बातें आपस में मेल खाती हैं. इलाज की उपलब्धता के बावजूद कुछ भाग्यशाली लोग ही इसका लाभ उठा पाते हैं क्योंकि इस तरह के इलाज पर भारत में छह लाख और विदेश में 12 लाख रुपये खर्च आता है. अधिक कीमत के अलावा इसके कुछ और भी दुष्परिणाम होते हैं, जिनसे रोगी की जान खतरे में पड़ जाती है.

थेलेसीमिया की बीमारी रक्त की एक विषम बीमारी है. एक विशेष ब्लड ग्रुप का पुरुष अगर किसी विशेष ब्लड ग्रुप की महिला से विवाह करता है तो उनकी संतान में यह बीमारी होने का जोखिम बढ़ जाता है. ऐसे में अगर लोगों को जागरूक किया जाए कि इस तरह के जोड़ों की शादी न हो और या फिर इस तरह के जोड़ों के बच्चों का गर्भावस्था में उचित देखभाल और इलाज कर दिया जाए तो यह बीमारी धीरे-धीरे अपने आप ही समाप्त होती चली जाएगी.