मुझे चाहिए रंगीन आज़ादी

दिन भर एक आम औरत कितना स्ट्रेस उठाती है. सुना है, ऊपर वाला उसे उतनी ताकत भी देता है. बाकी इंतज़ाम वह खुद कर लेती है, डी-स्ट्रेस होने के लिए… जिनमें कभी खाना, कभी शॉपिंग तो कभी किसी का सहारा लेना शामिल है.

दर्द सहने की हिम्मत जुटानी पड़ती है

कई औरतें पार्लर या सैलून जाना भी पसंद करती हैं. लेकिन इन सबके लिए उन्हें लोगों की बातें सुननी पड़ती है. सुंदर दिखने के लिए या खुद को तरोताज़ा करने के लिए पार्लर जाना भी कोई आसान काम नहीं है.

लोग समझते हैं कि औरतें आराम करती हैं, लेकिन पार्लर जाकर वहां ऐसा कुछ भी नहीं होता. पहले तो मन बनाना पड़ता है, समय निकालना पड़ता है, वहां दर्द सहने की हिम्मत जुटानी पड़ती है. फिर खर्चे के बारे में सोचना पड़ता है.

फिर, वापस आकर सबकी बातें सुननी पड़ती है – अच्छा… पार्लर गई थीं महारानी…!

बजट का रखना पड़ता है ध्यान

पार्लर में वे आपके बाल नोचते हैं, गरम-गरम वैक्स से कभी शरीर भी जला देते हैं, कभी रैशेस (चकत्ते) हो जाते हैं, कभी भौं तो कभी अंडर आर्म्स तो कभी होठों के पास देर तक दर्द सहना पड़ता है. सांस रोक कर वैक्सिंग और थ्रेडिंग करवानी पड़ती है.

पार्लर में बजट का ख़ासा ध्यान रखना पड़ता है. “आज सिर्फ इतना ही! क्यों, मैडम! पेडीक्योर नहीं करवाएंगी?” “नहीं, नहीं, समय नहीं है.” अब यह तो कह नहीं सकते, कि पैसे नहीं हैं.

एक तो बड़ा कन्फ्युजन रहता है – पेडीक्योर और मैनीक्योर में. बड़ी मुश्किल से याद किया मैंने… प से पैर इसलिए प से पेडीक्योर. पेडिक्योर में जहां वो पैरों को साफ करते हैं, मैनीक्योर में हाथों को सफाई की जाती है.

आती है तमाम चीजों की याद

गुड पार्ट यह है कि जितना समय पार्लर में गुज़रता है, जो एक से दो घंटा हो सकता है या उससे भी ज्यादा, उतनी देर फोन साइलेंट पर होता है. लेकिन, यही वह समय होता है जब दुनिया भर की चीज़ें याद आती हैं. दिमाग में उथल पुथल रहती है, उसे शांत करना पड़ता है.

स्कूल की यूनिफार्म से घर की सब्जी तक सारे काम याद आते हैं, इस दौरान. और पार्लर से निकलो तो 20 मिस्ड कॉल्स होंगी, सबको उसी वक़्त आपकी याद आती है. दूसरी तरफ, मन ही मन में एक बड़ी अच्छी फीलिंग तैरती है, छलांगे मारती है… एक साफ़ सुथरी ख़ुशी भरी खूबसूरत सी फीलिंग.

फ्रांस में खुला था पहला सैलून

आपने कभी सोचा है, सबसे पहला ब्यूटी सैलून कब-कैसे शुरू हुआ होगा? तब, बड़े घर के लोग या रॉयल, राजे-महाराजे पार्लर का आनंद उठा पाते थे. शुरआत कुछ 17वीं शताब्दी से हुई जब औरतों के लिए हेयर ड्रेसर्स और मर्दों के लिए नाई, घरों में आकर कई घंटों तक श्रृंगार करते थे. फ्रांस में पहला सैलून खुला था. फिर यह ट्रेंड देश-विदेश सब जगह मशहूर हुआ.

आजकल एक नया ट्रेंड आया है, रंगीन बालों से भरे अंडर आर्म्स. अगर आपको इस ट्रेंड से रु-ब-रु होने का मौका मिला हो तो अपने अनुभव शेयर कीजिएगा. कुछ औरतें कह रही हैं, इससे एक आज़ाद सी फीलिंग होती है.

इस आज़ादी से एक और टैबू टूट रहा है, शायद. आज़ादी भी कितनी रंगीन हो सकती है, यह समझने के लिए आप भी कोई रंग चुनकर यह अनुभव कर सकती हैं – नीला, पीला, बैगनी, लाल… मुस्कुराने की एक और वजह मिलेगी, ज़िन्दगानी में.

भारत बोल रहा है