मोदी चीन दौरे से क्या-क्या लेकर आए?

नौवें ब्रिक्स सम्मलेन (4 – 5 सितंबर 2017) की पूर्व संध्या पर चीन और भारत के बीच डोकलाम विवाद पर सहमती बनी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का सम्मलेन में भागीदारी का रास्ता प्रशस्त हो सका. चीन और भारत दोनों की मीडिया में इसके कई प्रकार के विश्लेषण किए गए हैं.

समझना यह है कि अगर चीन ने भारत के साथ कोई समझौता भी किया है तो अपने आर्थिक हित और अंतरराष्ट्रीय छवि को धयान में रखकर, न कि भारत की सैन्य-शक्ति या किसी वर्ल्ड लीडर के दबाव में आकर.

भारत के लिए चीन खतरा भी है और अवसर भी जबकि चीन के लिए भारत सिर्फ एक अवसर है जिसे चतुर चीन कभी खोना नहीं चाहेगा

शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांतो में विश्वास को कायम रखने की बात, द्वि-पक्षीय रिश्तों में राजनीतिक विश्वास को बनाए रखने का संकल्प, सीमा पर शांति और सौहार्द बनाए रखने की प्रतिबद्धता जैसे जुमले विदेश-नीति की औपचारिकताएं भर हैं, जिसे स्वतंत्रता पश्चात भारत और पड़ोसियों के आपसी संबंधो के संदर्भ में अक्सर दोहराया जाता रहा है, जो इस बार भी हुआ.

मोदी के वर्तमान चीन दौरे की महत्वपूर्ण बात रही वैश्विक रूपांतरण हेतु दस ‘नए संकल्प’: सुरक्षित विश्व, हरित विश्व, सक्षम विश्व, समावेशी विश्व, डिजिटल विश्व, कुशल विश्व, स्वस्थ विश्व, सामान अवसर वाला विश्व, संबद्ध विश्व, और मैत्रीपूर्ण विश्व. अब तक के लगभग सभी वैश्विक मंचो पर मोदी द्वारा आतंकवाद के खिलाफ आवाज बुलंद किया गया है.

साइबर सुरक्षा और आपदा प्रबंधन वर्तमान विश्व की बड़ी चुनौती है जिसपर विश्व-स्तर पर विधिक व्यवस्था की आवश्यकता है और मोदी ने इस सम्मलेन में विश्व सुरक्षा हेतु बल दिया. जलवायु परिवर्तन ने मानव जीवन को ही खतरे में डाल दिया है तो इसपर विश्व समुदाय का चिंतित होना लाज़िमी है. मोदी ने समकालीन मुद्दे पर भारत की चिंताओं को अत्यंत प्रासंगिक तरीके से रखा जो पूर्णत: सराहनीय है और समसामयिक भी.

इसमें कोई शक नहीं कि समकालीन विश्व प्रत्येक क्षेत्र में अत्यंत तेज गति से बदल रहा है; विकास की नई इबारतें लिखी जा रही हैं; दूरभाष, संचार, और इनफोर्मेसन तकनीक के क्षेत्र में क्रांति का दौर चल रहा है; अंतर-राज्य युद्ध अब इतिहास बन गया है क्योंकि अब भू-राजनीति से ज्यादा विश्व की महत्वपूर्ण शक्तियां भू-आर्थिक (जीओ-इकोनॉमिक्स) परिवेश और संबंध पर बल दे रही हैं.

ऐसे वैश्विक परिदृश्य में ब्रिक्स देशों का एक मंच पर संगठित होना और ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ को रिकॉर्ड समय में धरातल पर उतार देना अब तक के विकसित राष्ट्रों और भेद-भाव पर आधारित विश्व बैंक के लिए कड़ा सबक है और ब्रिक्स आर्थिक समूह की प्रासंगिकता और सफलता की कहानी.   

भारत-चीन के बीच सीमा पर गतिरोध को लेकर यह दूसरा मौका था जब भारत ने डट कर चीन का सामना किया

अत: मोदी की चीन यात्रा ब्रिक्स सम्मलेन के संदर्भ में तो सही और जोरदार लगती है परंतु इस प्रकरण में 73 दिनों तक चले डोकलाम गतिरोध के मद्देनज़र भारत-चीन के संबंधो पर भी चर्चा गरम रही. दो देशों के बीच मतभेद होना लोकतांत्रिक संबंध का परिचायक हो सकता है और मतभेद विवाद बन जाए तो युद्ध का कारण भी बनता है.

भारतीय एवं चीनी मिडिया ने तो इस बार लगभग युद्ध करवा ही दिया था. गौरतलब है कि चीन लगातार यह बताता रहा है कि 14 पड़ोसियों के साथ उसकी थल सीमा लगती है और उनमे से 12 के साथ उसने अपने विवाद सुलझा लिए हैं, केवल भारत और भूटान के साथ विवाद बरक़रार है. भारत के साथ अप्रैल 2016 तक सीमा विवाद सुलझाने हेतु विमर्श के 19 दौर हो चुके थे. इस परिचर्चा के दौर को आगे बढ़ाते हुए समय की मांग है कि सीमा-विवाद को सुलझा कर आर्थिक साझेदारी बढे. इस फ्रंट पर सफलता के भारत-पाकिस्तान संबंध पर भी दूरगामी परिणाम दिखेंगे.

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