नेपाल में संविधान का खेल

नेपाल की राजनीति में सत्ता संघर्ष का एक खेल हाल ही में दिखा. राजनीतिक दलों के बीच महीनों चली हलचल से समीकरण लगातार बदल रहे थे. सत्ता के लिए सौदेबाजी चल रही थी.

खड्ग प्रसाद ओली उर्फ़ के.पी. शर्मा ओली ने बदलते राजनीतिक समीकरण के मध्य प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया और पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने अगले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली.

नेपाल में नए संविधान स्वीकृत होने के बाद ओली देश के पहले प्रधानमंत्री बने थे. वैसे पिछले दस वर्षों में ओली नेपाल के आठवें प्रधानमंत्री थे और 1990 में बने अंतरिम संविधान के पश्चात वे नेपाल के 23वें प्रधानमंत्री थे.

अनिश्चितताओं में झूलता देश 

निश्चय ही नेपाल की राजनीति नए संविधान के लागू होने के बाद भी अपरिपक्वता के दौर से गुजर रही है. देश अब भी राजनीतिक आधुनिकीकरण के संदर्भ में अत्यंत पिछड़ा है जो किसी राष्ट्र के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक आधुनिकीकरण का कारण बनता है.

नेपाल का पांचवां और वर्तमान संविधान सात वर्षों के अथक परिश्रम और राजनीतिक हलचल एवं उतार-चढ़ाव के पश्चात 20 सितंबर 2015 को जारी कर राष्ट्र को समर्पित किया गया था.

वर्तमान संविधान ने नेपाल के लिए एक संघीय गणराज्य की व्यवस्था की है. संघवाद इसका मूल सिद्धांत है जिसका मतलब साफ है कि राजशाही का औपचारिक रूप से अंत हो जाना.

नए संविधान की मूल भावना यह है कि नेपाल के शासन में प्रत्येक नेपाली नागरिक की बराबर की भागीदारी होगी. संविधान की प्रस्तावना में बहुदलीय लोकतांत्रिक प्रणाली, मानवाधिकार, व्यस्क मताधिकार, प्रेस की आज़ादी, और कानून सम्मत समाजवाद की बुनियाद रखने की बात कही गई है.

नए प्रधानमंत्री ने सभी पक्षों को खुश करने की बात तो कही है और संघर्षरत मधेशियों के साथ कुछ समझौते भी किए हैं. लेकिन ये समझौते कोई स्थाई हल निकाल पाएंगे, इस बात को लेकर संदेह है.

भारत और नेपाल संबंध 

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प्रचंड और मोदी

भारत ने हर मोड़ पर नेपाल का साथ दिया है और अपनी तरफ से एक महती भूमिका निभाने का प्रयास किया है. नव नियुक्त प्रधानमंत्री प्रचंड ने कहा है कि नेपाल भारत से असल दोस्ती चाहता है लेकिन कोई नेपाल को ‘यस मैन’ के रूप में देखे ये मुमकिन नहीं है.

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इस राजनीतिक संस्था में अपने अटूट विश्वास के लिए लगभग विश्वभर में प्रशंसा का पात्र रहा है. भारत का रवैया नेपाल के प्रति सदैव सहयोगात्मक रहा है परंतु नेपाल शायद हमेशा से भारत के प्रति सशंकित रहा है और भारत से भयादोहन करने में प्रयासरत रहा है.

चीन के प्रति अपने झुकाव को दर्शाकर नेपाल भारत के साथ सौदेबाजी भी करने की कोशिश करता रहता है.

बतौर प्रधानमंत्री अपनी पहली पारी में भारत के मुकाबले चीन को तरजीह देने वाले नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड का दूसरी पारी में रुख बदला हुआ दिखना चाहिए.

नए राजनीतिक परिवेश पर टिप्पणी करते हुए पत्रकार कुलदीप कुमार कहते हैं, नेपाल में माओवादी एक बार फिर सत्ता में आ गए हैं. माओवादी नेता प्रचंड ऐसे समय में प्रधानमंत्री बने हैं जब भारत के साथ नेपाल के संबंध बहुत अच्छे नहीं हैं.

बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह बयान दोनों देशों की जनता को अपील करता है – भारत और नेपाल के बीच के रिश्ते सिर्फ दो सरकारों के बीच नहीं, बल्कि दोनों देशों के लोगों के बीच है.

भारत बोल रहा है