आज के डिजिटल दौर में जब भी हमें कहीं घूमने जाना होता है, तो हमारा सबसे पहला कदम क्या होता है? मोबाइल उठाना, किसी नामी ट्रैवल वेबसाइट पर जाना और वहां दिख रहे होटलों की फाइव स्टार रेटिंग और चमकदार रिव्यू देखकर कमरा बुक कर देना. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिन चमचमाते रिव्यू पर भरोसा करके आप अपनी गाढ़ी कमाई खर्च कर रहे हैं, वे कितने असली हैं? क्या वे रिव्यू सचमुच किसी यात्री ने अपने वास्तविक अनुभव से लिखे हैं, या फिर यह होटल मालिकों और वेबसाइट्स के बीच चल रहा कोई प्रायोजित (Sponsored) खेल है?

आइए इसे एक सच्ची और आंखें खोल देने वाली कहानी से समझते हैं.
एक छोटे होटल मालिक का दर्द: वाई-फाई ठीक नहीं, तो पूरा धंधा चौपट?
हाल ही में एक छोटे से होटल के मालिक ने अपना दर्द बयां किया. उनका होटल कोई बड़ी इंटरनेशनल चेन नहीं, बल्कि एक साधारण फैमिली बिजनेस (पारिवारिक व्यवसाय) है, जिसे वे बड़ी मेहनत और ईमानदारी से चलाते हैं. उन्होंने बताया कि एक नामी ट्रैवल वेबसाइट ने उनके होटल को बेहद खराब और कम स्कोर दे दिया.
उनका दावा था कि होटल में दी जाने वाली सुविधाओं, साफ-सफाई और व्यवहार के हिसाब से उनके होटल को 10 में से कम से कम 9 अंक मिलने चाहिए थे. लेकिन सिर्फ इसलिए कि उस दिन उनके यहां वाई-फाई (Wi-Fi) का नेटवर्क थोड़ा धीमा था, वेबसाइट ने उनकी रेटिंग को अर्श से फर्श पर लाकर खड़ा कर दिया. अब सवाल यह उठता है कि क्या किसी छोटे व्यवसायी की सालों की मेहनत को सिर्फ एक तकनीकी कमी के आधार पर इस तरह खारिज कर देना जायज है?
द ट्रिप कंपनी के सीईओ सुमित देव कहते हैं, “सच्ची यात्राएं एल्गोरिदम या स्क्रीन पर चमकते नकली सितारों से नहीं, बल्कि इंसानी भरोसे और साझा अनुभवों से तय होती हैं. जब डिजिटल रेटिंग्स में से सच्चाई गायब हो जाए, तो पर्यटन उद्योग अपनी साख खोने लगता है.”
बिना अनुभव के रेटिंग: ग्राहकों को पटाने का डिजिटल फरेब
चाहे किसी होटल की बुकिंग हो या ऑनलाइन सामान (Consumer Goods) की खरीदारी, आज दोनों जगह एक ही ढर्रा चल रहा है. आज का कड़वा सच यह है कि इन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर बहुत सी रेटिंग्स ग्राहकों के रियल टाइम एक्सपीरियंस (वास्तविक अनुभव) के बिना ही कर दी जाती हैं. पर्दे के पीछे पेड रिव्यू (पैसे देकर लिखवाए गए रिव्यू) का एक बहुत बड़ा नेक्सस काम कर रहा है. कंपनियों के कहने पर चंद रुपयों में फर्जी रिव्यू लिखने वाली एजेंसियां बैठी हैं, जो कंप्यूटर पर बैठकर उन होटलों की तारीफों के पुल बांध देती हैं जहां वे कभी पैर तक नहीं रखीं.
यह सीधे तौर पर आम ग्राहकों को अपने जाल में फंसाने और उन्हें पटाने का एक सोचा-समझा फरेब है. इस डिजिटल बहकावे में आकर जब ग्राहक वहां पहुंचता है, तो उसे हकीकत कुछ और ही मिलती है.
बहकावे में न आएं, खुद बनें जागरूक
भारत बोलेगा का अपने सभी पाठकों से यही कहना है कि ऑनलाइन दिख रहे हर थंब्स अप या फाइव स्टार को सच मानने की भूल बिल्कुल न करें.
समीक्षाओं को परखें: केवल टॉप के अच्छे रिव्यू न देखें, बल्कि क्रिटिकल या सबसे खराब रेटिंग वाले रिव्यू भी पढ़ें. वहां आपको असली कमियां पता चलेंगी.
स्थानीय स्तर पर जांचें: यदि संभव हो तो होटल के सोशल मीडिया पेज या सीधे कॉल करके जानकारी लें.
अपनी रेटिंग ईमानदारी से दें: जब आप खुद कहीं जाएं, तो किसी के दबाव या लालच में आए बिना, अपने वास्तविक अनुभव के हिसाब से ही रेटिंग दें.
याद रखिए, डिजिटल दुनिया में आपकी सजगता ही आपकी सबसे बड़ी सुरक्षा है. अगली बार बुकिंग करने से पहले आंखें और कान दोनों खुले रखें, ताकि आप किसी प्रायोजित धोखे का शिकार न बनें!
तुमसे अच्छा कौन है!