जब मेरी रसोइया पहली बार मेरे घर आई, तो वह अपने साथ सिर्फ मसालों की खुशबू या रोटी बेलने की कला नहीं लाई थी. वह अपने साथ विश्वास लेकर आई थी.

घरों में काम करने वाले लोगों के साथ एक रिश्ता धीरे-धीरे बनता है. सब्जी काटते हुए, आटा गूंथते हुए, चाय बनाते हुए वे अपनी जिंदगी के छोटे-छोटे किस्से सुनाने लगते हैं, जैसे महंगाई की चिंता, बच्चों की पढ़ाई, बीमारी का खर्च, घर की परेशानियां. ये बातें किसी औपचारिक शुरुआत की मोहताज नहीं होतीं. बस एक दिन बातचीत का हिस्सा बन जाती हैं.
एक दिन उसने अपने पति के बारे में बताया.
कई वर्ष पहले वे एक निजी सुरक्षा कंपनी में सुरक्षा गार्ड थे. उनका काम था देर रात तक काम करने वाले कर्मचारियों, विशेषकर महिलाओं को सुरक्षित घर पहुंचाना. 2020 तक सब ठीक चलता रहा. फिर कोविड आया. दफ्तर बंद हो गए, लोग घर से काम करने लगे और सुरक्षा कर्मियों की जरूरत कम हो गई. लाखों लोगों की तरह उनकी भी नौकरी चली गई.
लेकिन एक उम्मीद बची थी. उनका भविष्य निधि (PF). वह पैसा जो हर महीने उनकी तनख्वाह से काटा गया था. वह पैसा जो कानूनी रूप से उन्हीं का था. लेकिन चार साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी वे उसे निकाल नहीं पाए थे.
उन्होंने कोशिश की थी, कार्यालयों के चक्कर लगाए थे, लोगों से पूछा था, इंतजार किया था. लेकिन कुछ भी आगे नहीं बढ़ा.
जब उसने मुझसे मदद मांगी, तो मुझे लगा कि शायद यह सिर्फ ऑनलाइन लॉगिन करने भर की बात होगी. लेकिन मामला उससे कहीं अधिक उलझा हुआ था.
पहले यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (UAN) सक्रिय नहीं था. उसे सक्रिय कराया गया. फिर नाम में विसंगति निकली, जिसे दस्तावेजों के आधार पर सुधारने का अनुरोध किया गया. अब केवल एक अंतिम चरण बचा था – पूर्व नियोक्ता की स्वीकृति.
और वहीं पूरी प्रक्रिया रुक गई. न आवेदन अस्वीकार हो रहा था, न स्वीकृत. बस महीनों तक एक ही स्थिति में अटका रहा. फोन किए गए. कोई जवाब नहीं मिला. संदेश भेजे गए. कोई प्रतिक्रिया नहीं आई. आधुनिक नौकरशाही की सबसे बड़ी विडंबना यही है: कोई आपको सीधे ‘नहीं’ नहीं कहता, वे बस कभी ‘हां’ भी नहीं कहते.
आखिरकार मेरी रसोइया किसी तरह कंपनी के एक कर्मचारी तक पहुंची. उसने दया करके फोन मानव संसाधन (HR) विभाग तक पहुंचा दिया. यहीं से मेरी बातचीत शुरू हुई. दूसरी तरफ बैठे अधिकारी को इस मामले में कोई विशेष रुचि नहीं थी. मेरी बातों का उन पर कोई असर नहीं हुआ.
तब मैंने एक ऐसा निर्णय लिया, जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी. मैंने उन्हें यह विश्वास दिला दिया कि मैं भविष्य निधि विभाग की ओर से बात कर रही हूं.
अचानक बातचीत का स्वर बदल गया. अब बहाने आने लगे, जैसे सिस्टम काम नहीं कर रहा, OTP नहीं आ रहा, सर्वर में दिक्कत है, नेटवर्क नहीं चल रहा. पिछले कुछ दिनों में मैं कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) की प्रक्रिया के बारे में इतना पढ़ चुकी थी कि मुझे तुरंत समझ आ गया कि इसका अर्थ क्या है. कोई तकनीकी खराबी नहीं थी; केवल OTP की सीमा पूरी हो चुकी थी और कुछ समय बाद फिर प्रयास करना था.
जब मैंने यह बात उन्हें समझाई, तो शायद उनका विश्वास और पक्का हो गया कि वे सचमुच किसी अधिकारी से बात कर रहे हैं. मामला उनके वरिष्ठ अधिकारी तक पहुंचा. लेकिन वहां स्थिति और भी खराब हो गई. बातचीत अपमानजनक हो गई, गालियां शुरू हो गईं. वे गालियां सिर्फ अशिष्ट नहीं थीं; वे हमारी सामाजिक मानसिकता का आईना थीं, जहां किसी पुरुष का क्रोध भी अंततः किसी स्त्री का अपमान करके ही व्यक्त किया जाता है.
मैंने उन्हें स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि एक नागरिक के साथ ऐसा व्यवहार किया जाएगा, तो मैं इस पूरे मामले की शिकायत उच्च अधिकारियों तक पहुंचाऊंगी और यह भी बताऊंगी कि एक कर्मचारी का वैध दावा वर्षों तक केवल लापरवाही के कारण रोका गया.
शायद उन्हें पहली बार लगा कि अब जवाब देना पड़ेगा.
अगली सुबह मेरी रसोइया मेरे पास आई. उसके हाथ में मोबाइल था. उसने एक स्क्रीनशॉट दिखाया. पूर्व नियोक्ता ने आखिरकार आवेदन स्वीकृत कर दिया था. अब मामला EPFO के पास पहुंच चुका था. चार वर्षों में पहली बार प्रक्रिया आगे बढ़ी थी. वह मुझे बार-बार धन्यवाद दे रही थी.
लेकिन मेरे मन में खुशी से ज्यादा एक सवाल था: आखिर ऐसा क्यों हुआ?

किसी व्यक्ति को अपना ही पैसा पाने के लिए किसी ऐसे इंसान की जरूरत क्यों पड़े जो सरकारी पोर्टल समझता हो, दस्तावेज पढ़ सकता हो, त्रुटि संदेशों का अर्थ जानता हो, और संस्थाओं से बात करने का आत्मविश्वास रखता हो?
हम अक्सर कहते हैं कि तकनीक ने सब कुछ आसान बना दिया है. लेकिन क्या सचमुच ऐसा हुआ है? मोबाइल होना और मोबाइल चला पाना, दो अलग बातें हैं. OTP आ जाना और यह समझना कि उसका क्या करना है, दो अलग बातें हैं. ऑनलाइन पोर्टल होना और उसे आत्मविश्वास के साथ इस्तेमाल कर पाना, दो अलग बातें हैं.
तकनीक ने कागज कम किए होंगे, लेकिन उसने अदृश्य दीवारें भी खड़ी कर दी हैं. हम जैसे पढ़े-लिखे लोग उन दीवारों को महसूस भी नहीं करते. UAN सक्रिय करो, पहचान सत्यापित करो, नाम ठीक कराओ, दस्तावेज अपलोड करो, OTP डालो, स्थिति देखो, जरूरत पड़े तो शिकायत दर्ज करो. हमारे लिए यह सामान्य प्रक्रिया है. लेकिन जिसने कभी स्मार्टफोन ठीक से इस्तेमाल नहीं किया, जिसे यह भी नहीं पता कि UAN क्या होता है, उसके लिए यह एक भूलभुलैया है.
हम डिजिटल विभाजन को अक्सर इंटरनेट की उपलब्धता से जोड़कर देखते हैं. लेकिन असली विभाजन इंटरनेट का नहीं, बल्कि ज्ञान, भाषा, आत्मविश्वास और संस्थागत शक्ति का है.
मेरी रसोइया की बात किसी ने गंभीरता से नहीं सुनी. लेकिन जिस क्षण उन्हें लगा कि सामने कोई अधिकारी है, उनका व्यवहार बदल गया. यही सबसे बड़ी विडंबना है. उस दिन मेरी रसोइया मुझे धन्यवाद दे रही थी, लेकिन सच यह है कि मैंने कोई असाधारण काम नहीं किया. मेरे पास सिर्फ वह सुविधा थी जो उसके पास नहीं थी—प्रक्रिया को समझने की क्षमता, संस्थाओं से संवाद करने का आत्मविश्वास, और यह विश्वास कि अगर मैं सवाल पूछूंगी, तो शायद कोई जवाब देगा.
किसी भी नागरिक को अपना ही पैसा पाने के लिए किसी दूसरे की शिक्षा, भाषा, आत्मविश्वास या कथित प्रभाव की जरूरत नहीं होनी चाहिए.
हम अक्सर पूछते हैं कि भारत कितना डिजिटल हो गया है. शायद अब हमें यह पूछना चाहिए—क्या भारत उतना ही सुलभ भी हुआ है? जिस दिन इस प्रश्न का उत्तर “हां” होगा, उसी दिन तकनीक सचमुच लोकतांत्रिक कहलाएगी.
और जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक नागरिकों के हक के लिए भारत बोलेगा!
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