किसी भी बड़े बदलाव की शुरुआत एक सोच और एक सपने से होती है. जब नेतृत्व का जज्बा मन में पकता है, तो वह केवल सत्ता की चाह नहीं, बल्कि देश को सही दिशा देने का संकल्प बन जाता है. अगर मुझे इस देश के प्रधानमंत्री के रूप में लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराकर देश के 140 करोड़ नागरिकों को संबोधित करने का अवसर मिले, तो मेरा पहला भाषण कोई खोखला वादा नहीं, बल्कि एक सख्त और दूरदर्शी मैसेज होगा.

पहला कदम: हाथ में हेलमेट और एक स्ट्रांग मैसेज
लाल किले के प्रांगण में जब मैं माइक के सामने खड़ा हूंगा, तो मेरे हाथ में एक हेलमेट होगा – कोहनी में फंसाया हुआ. भाषण में हेलमेट पर कोई लंबा भाषण नहीं होगा, बस एक स्ट्रांग मैसेज होगा! यह हेलमेट हाथ में लटकाने के लिए नहीं, माथे पर पहनने के लिए है. अपनी जान हथेली पर लेकर न चलें – जान है तो जहान है. हमें अपनी सड़कों पर होने वाली मौतों को रोकना है, और इसका योगदान हर नागरिक को आज से ही शुरू करना होगा.
अल्बर्ट आइंस्टीन साहेब ने कहा था: “इमेजिनेशन इज़ एवरीथिंग. इट इज़ द प्रीव्यू ऑफ लाईफ़्स कमिंग अट्रेक्शंस.” (कल्पना ही सबकुछ है; यह जीवन के आने वाले आकर्षणों का पूर्वावलोकन है.) इस कथन पर सफलता के सूत्रों पर लेखनी चलाने वाले जैक कैनफ़ील्ड लिखते हैं: “सी वॉट यू वांट; गेट वॉट यू सी.”
स्कूल में जब हाउस वाइस कैप्टन का रोल मिला, फिर मीडिया संस्थान PTI (प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया) में कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला, तब से नेतृत्व एक जुनून बनता गया. अब मैं बड़ा हो गया हूं और एक मजबूत, सुरक्षित व एकजुट भारत का सपना देखता हूं. कहते हैं, हजारों मील की यात्रा एक कदम से शुरू होती है, और यह विचार मेरा पहला कदम है.
कानून का राज, नारी सम्मान और बच्चों का भविष्य
लाल किले से मैं देश के सामने तीन बुनियादी सवाल रखूंगा जो किसी भी सभ्य समाज की रीढ़ होते हैं: हमारे देश के कानून कितने प्रभावी हैं? हमारी नारी कितनी शक्तिशाली है? और हमारे बच्चों का भविष्य कितना उज्जवल है? नागरिकों को यह विश्वास दिलाना जरूरी है कि:
- अगर कानून मज़ाक बनेगा, तो भारत बोलेगा!
- अगर नारी का अपमान होगा, तो भारत बोलेगा!
- अगर देश का बच्चा अशिक्षित रहेगा, तो भारत बोलेगा!
कानून का सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य है. लेकिन जब कानून बाहुबलियों और पूंजीपतियों के हाथों का खिलौना बन जाए, तो यह हमारे लोकतंत्र के लिए खतरा बन जाता है. हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून का पालन हर व्यक्ति करे, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो.
मेगस्थनीज़ ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में लिखा था कि भारतीय वास्तव में ‘उल्लेखनीय रूप से कानून का पालन करने वाले लोग हैं.’ चौथी सदी में आए चीनी यात्री फाह्यान ने भी लिखा कि भारत में अपराध ‘दुर्लभ’ हैं. फिर आज का भारत इतना भिन्न क्यों है? बलशाली बेखौफ क्यों हैं और कानून का पालन करने वाला सामान्य नागरिक तवे पर भुना क्यों जा रहा है?
मेरे वरिष्ठ सहयोगी अनिल माहेश्वरी (Anil Maheshwari) ने हाल ही में एक वाकया साझा किया था – सुप्रीम कोर्ट के प्रांगण से एक महिला गुलाब का फूल तोड़ रही थी. जब किसी ने टोका, तो उसने कहा, “लोग मर्डर कर रहे हैं, दिल तोड़ रहे हैं… तब कोई कुछ नहीं कहता!” यह गुस्सा पूरी तरह जायज है. हमारे सम्बन्धी सुनीता सिंह (Sunita Singh) देश की बेटी ‘निर्भया’ के माता-पिता के साथ हर पल धड़कन की तरह खड़ी रहती हैं. लेकिन आज समाज का रवैया ऐसा हो गया है कि पीड़ित को ही दोषी की तरह ट्रीट किया जाता है, जबकि असली दोषी जेलों से बाहर टहलते हैं. मैंने अदालतों के प्रांगण में अपनी जवानी बिताई है, मैं बेचैनी और सुकून का अंतर अच्छी तरह समझता हूँ.
इसी तरह, नारी शक्ति हमारे समाज की असली रीढ़ है. अगर नारी का अपमान होगा तो यह पूरे समाज का अपमान है. अपनी नानी, मां, बहन, भाभी, पत्नी और बेटियों के साथ वक्त बिताकर मैंने उन्हें करीब से महसूस किया है. मैं कह सकता हूं कि परिवार, न्याय और प्रेम की समझ उनसे बेहतर मुझे है जिन्हें यह नसीब नहीं हुआ.
ए. एल. बाशम ने अपनी किताब ‘द वंडर दैट वाज़ इंडिया’ में लिखा था कि इतिहास में महिला को हमेशा कानूनन नाबालिग माना गया. आज हमें इस सोच को बदलना होगा. ‘द ग्रेट इंडियन किचन’ और ‘मिसेज’ जैसी फिल्में हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि एक औरत अपने ही घर में कितनी स्वतंत्र है. मेरे मित्र जसवीन जस्सी (Jaswin Jassi) की किताब ‘हैव गट्स’ के विमोचन पर मैंने कहा था— “पत्नी पुरुष का आधा हिस्सा होती है, सबसे अच्छी मित्र होती है… पत्नी के साथ ही पुरुष महान कार्य करता है और साहस पाता है.”
और जहां तक बच्चों का सवाल है—अगर देश का बच्चा अशिक्षित रहेगा, तो भारत कभी आगे नहीं बढ़ सकता. शिक्षा को हर बच्चे का अधिकार बनाना हमारी पहली प्राथमिकता होगी.
जल, नदियां और बुनियादी स्वच्छता पर युद्धस्तर पर काम
आज हमारी भूमि, जल और स्वाभिमान संकट में हैं. सीधी बात जो मुझे जन-जन से कहनी है— “नदियां प्रदूषित होंगी, तो मनुष्य प्यासा होगा.” क्या आप प्यासे जी सकते हैं? फिर नदियों के लगातार ज़हरीले होने पर हम चुप क्यों हैं? गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां सिर्फ धर्म का प्रतीक नहीं, करोड़ों का जीवन हैं.
जल से ही भोजन जुड़ा है. भूखे व्यक्ति के लिए पहली प्राथमिकता राशन है. हमारी सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि हर घर तक राशन पहुंचे, और भाषण केवल प्रेरणा का स्रोत बने, समाधान का विकल्प नहीं.
यह कितनी बड़ी विडंबना है कि 21वीं सदी में भी लोगों के पास स्वच्छ पेयजल और हाथ धोने जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं! अशुद्ध पानी के कारण शहरों में हैजा, टाइफाइड और डायरिया जैसी गंभीर बीमारियां फैलती हैं. हमारी सरकार स्वच्छता और सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था युद्धस्तर पर करेगी. दुनिया 70% पानी से बनी है, फिर भी हम अपने ही घर के नल का पानी सीधा पीने से डरते हैं. इस स्थिति को हर हाल में बदलना होगा.
सच्ची देशभक्ति, सेना का सम्मान और तिरंगे की गरिमा
साल 2000 में प्लेन में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से मिलने का मौका मिला था. उन्होंने कहा था: “यदि साझा किया जाए तो कोई भी सपना बड़ा नहीं होता!” उन्होंने भारत को एक विकसित देश बनाने का सपना देखा था, और उसी सपने को आगे बढ़ाना मेरा लक्ष्य है.
लाल किले से आपका यह प्रधानमंत्री आपको विश्वास दिलाएगा कि:
- कोई राष्ट्र प्रेम भूलेगा तो… भारत बोलेगा!
- सैनिकों का मनोबल गिरेगा तो… भारत बोलेगा!
- किसान अपनी पैदावार का मूल्य निर्धारित नहीं करेगा तो… भारत बोलेगा!
देशभक्ति का मतलब केवल ताली या थाली बजाना नहीं है, बल्कि अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से पालन करना है. राष्ट्रगान को सिनेमा हॉल में जबरन गवाना या न गाने वालों को निशाना बनाना देशभक्ति नहीं है. अपने ही देश के नागरिकों पर गोलियां चलाना या दंगे करवाना देशभक्ति नहीं हो सकता. यदि ऐसी कोई नफरत की पाठशाला चल रही है, तो उसे तत्काल बंद किया जाएगा.
सैनिक किसी को मारने के लिए जन्म नहीं लेता. वह जब दुश्मन पर गोली चलाता है, तो वह राष्ट्र प्रेम की पराकाष्ठा होती है. हमें तिरंगे की गरिमा को भी पुनर्जीवित करना है. तिरंगा केवल एक कपड़ा नहीं, हमारे आदर्शों का प्रतीक है. इसका बिना मकसद या स्वार्थ के लिए गलियों में इस्तेमाल इसकी महत्ता को कम करता है. तिरंगा फहराना एक सामूहिक और पवित्र उत्सव होना चाहिए. मेरी एजेंसी जी कैफे (G Caffe) के एक सहयोगी ने एक त्योहार पर बहुत सुंदर नारा लिखा था— “होली रंगों से खेलें, दंगों से नहीं!” हमें इसी सोच को अपनाना होगा.
धार्मिक कट्टरवाद का अंत और मानवता का पुनरुत्थान
आज धार्मिक कट्टरवाद (Religious Fundamentalism) और अंधराष्ट्रवाद (Chauvinistic Nationalism) के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं ने मानवता का पतन कर दिया है. दुराचार, अत्याचार, भ्रष्टाचार, व्यभिचार और पापाचार आम हो गया है. लेकिन लाल किले से मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं – “हमारी सरकार में निर्दोषों की चीखें अनसुनी नहीं होंगी, अब भारत चुप नहीं रहेगा.”
भगवान राम की जन्मस्थली को रक्तरंजित करने वाले कभी हिंदू नहीं हो सकते, वे केवल सत्ता के गिद्ध हैं. 1992 में अयोध्या में जो हुआ, उस पर तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने ठीक ही कहा था कि वह पूरे राष्ट्र के लिए शर्म और विश्वासघात का विषय था.
गलत धार्मिक व्याख्याओं (Religious Interpretation) ने भाई को भाई से लड़ा दिया है. मेरे ससुराल में बड़ी बहन सुषमा उपाध्याय (Sushma Upadhyay) ने एक कविता लिखी थी जो आज के दौर का कड़वा सच बयान करती है:
“राम, क्या ऐसे मंदिर में तुम रह पाओगे? जहां एक-एक सांस है भारी, लेकिन नहीं किसी की ज़िम्मेदारी… क्या लाशों के अंबार की नींव पर तुम अपनी प्राण प्रतिष्ठा सह पाओगे!”
लाल किले से देश को यह भरोसा दिलाना मेरी प्राथमिकता होगी कि दुराचार और भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म किया जाएगा. भारत वह सभ्यता है जहां शैलेंद्र के बोल गूंजते हैं – “हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है.”
माइकल वुड की किताब ‘द स्टोरी ऑफ इंडिया’ की तरह, हमें भी एक ऐसी कहानी का हिस्सा बनना है जिसे आने वाली पीढ़ियां गर्व से गुनगुनाएं.
अंत में, मुझे एक छोटी सी कहानी याद आती है – एक बूढ़ी औरत गिलास में पानी भर-भरकर बस्ती में लगी आग पर फेंक रही थी. किसी ने पूछा, “अम्मा, क्या तेरे इस एक गिलास पानी से यह भीषण आग बुझेगी?” बूढ़ी अम्मा ने मुस्कुराकर कहा— “मुझे पता है कि आग इससे नहीं बुझेगी, लेकिन जब भी इस आग का इतिहास लिखा जाएगा, मेरा नाम आग लगाने वालों में नहीं, बल्कि आग बुझाने वालों में दर्ज होगा!”
आइए, मिलकर संकल्प लें कि हम कानून का सम्मान करेंगे, नारी को अधिकार देंगे, हर बच्चे को पढ़ाएंगे और पर्यावरण को बचाएंगे. जब हम अपने कर्तव्यों को पहचानेंगे, तभी भारत बोलेगा—और उसकी आवाज पूरी दुनिया में गूंजेगी!
केवल मूकदर्शक नहीं