जब लोकतंत्र के स्तम्भ बिकने लगेंगे, तब भारत चुप नहीं रहेगा

लाल किले की प्राचीर से दिए जाने वाले मेरे सम्भावित संबोधन की पहली कड़ी आप पढ़ चुके हैं. लेकिन राष्ट्र निर्माण का यह संकल्प केवल एक भाषण तक सीमित नहीं है. आज जब देश की राजनीति और सामाजिक ताना-बाना एक नाज़ुक मोड़ पर खड़ा है, तब हमें एक नागरिक और एक भावी नेतृत्व के रूप में यह तय करना होगा कि हम देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं.

The peacock cries – Oh who will show me the way to Vrindavan? He raises his tail and cries: Krishna! Krishna!
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च में तो हर माता-पिता अपने बच्चे को ले जाते हैं, लेकिन वे स्कूल क्यों नहीं पहुंचा पाते?

The peacock cries –

Oh who will show me the way to Vrindavan?

He raises his tail and cries:

Krishna! Krishna!

यह पंक्तियां विलियम डेलरिम्पल (William Dalrymple) की किताब ‘नाइन लाइव्स – इन सर्च ऑफ द सेक्रेड इन मॉडर्न इंडिया’ में उल्लिखित बंगाल के एक लोक गीत से हैं. लेकिन आज सवाल यह उठता है कि जो नेतृत्व सत्ता के गलियारों में केवल धर्म के नाम पर डींगे हांक रहा है, वह श्री कृष्ण और श्रीराम का पुजारी है, बाल ब्रह्मचारी है, या फिर कुछ उद्योगपतियों के हाथों की कठपुतली? भारत अब बोलेगा!

यह भरोसा हर देशवासी को दिलाना है कि देश का कोई भी स्तम्भ बिकेगा, तो भारत बोलेगा. कोई हम नागरिकों के सपनों को तोड़ेगा, तो भारत बोलेगा. भारत की आत्मा उसके नागरिकों के सपनों में बसती है. सड़क पर गाड़ियों की धूल उड़ाता सूट-बूट में चल रहा व्यक्ति नेतृत्व नहीं दे सकता.

आज हमारे सामने चार बड़ी तस्वीरें हैं जो चीख-चीखकर कह रही हैं कि देश के स्तम्भ कमजोर हो रहे हैं:

  1. राम मंदिर चंदा घोटाला (Ram Mandir Donation Scam): जिस आस्था के नाम पर देश के करोड़ों गरीबों ने अपनी गाढ़ी कमाई का एक-एक रुपया दिया, जब उस चंदे में घोटाले और भ्रष्टाचार की खबरें सामने आती हैं, तो धर्म शर्मसार होता है. भगवान राम के नाम पर अधर्म का यह व्यापार सत्ता के संरक्षण के बिना संभव नहीं है.
  2. छात्र आंदोलन और लाठियां: जब देश का युवा और छात्र अपनी फीस, परीक्षा में धांधली और रोजगार के लिए सड़कों पर उतरते हैं, तो उन पर लाठियां बरसाई जाती हैं. आज भले ही इस मुद्दे को विपक्षी पार्टियां राजनीतिक ढाल बना रही हों, लेकिन असल सवाल यह है कि हमारे बच्चों को सड़कों पर घसीटा क्यों जा रहा है?
  3. ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) और राष्ट्रीय सुरक्षा: पहलगाम के घाव अभी भरे नहीं हैं. हमारी बहादुर सेना ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के जरिए ईंट का जवाब पत्थर से दिया है. लेकिन लाल किले से हमें यह समझना होगा कि सुरक्षा सिर्फ बंदूकों से नहीं, बल्कि एक मजबूत और निष्पक्ष कूटनीति से तय होती है.
  4. ईरान-अमेरिका-इजराइल युद्ध (Iran-US-Israel War): मध्य पूर्व (Middle East) में भड़की युद्ध की आग और परमाणु हथियारों की होड़ से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था डगमगा रही है. भारत जैसे देश के लिए पेट्रोल, डीजल और वैश्विक शांति पर इसका सीधा असर पड़ रहा है.

मुफ्त के राशन का ‘भाषण’ और गिरते सामाजिक स्तम्भ

समानता की घोर कमी आज हर जगह दिख रही है. भारत में जातिवाद, लिंग भेद और धर्म के आधार पर विभाजन बढ़ता जा रहा है. मौजूदा नेतृत्व की उदासीनता और उसके असुखी सलाहकारों की वजह से हमारी सामाजिक सुरक्षा खतरे में है.

मुफ्त अनाज और मुफ्त बिजली-पानी बांटने वाला नेतृत्व भारत को ‘विश्वगुरु’ कैसे बना सकता है? क्या यही है वह ‘विकास’ जहां देश की एक बड़ी आबादी राशन की दुकान के बाहर लाइन में खड़ी होकर केवल भाषण सुनती रहे?

वासना और सत्ता की भूख में डूबा हुआ नेतृत्व कभी किनारा नहीं पा सकता. आज हमारे आर्थिक स्तम्भ महंगाई और बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं. जब हाथों में हुनर है, तो ये हाथ खाली क्यों हैं? शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश की कमी ने हमारे मिडिल क्लास और गरीब परिवारों के भविष्य को अंधकार में ढकेल दिया है.

शिक्षा: क्या पूजा स्थल और कुंभ-हज केवल दर्शन के लिए हैं?

न्याय और नारी सम्मान की बात के बाद सबसे बड़ा सवाल बच्चों की शिक्षा का है. हमारे बच्चों का भविष्य ही देश का भविष्य है. कालिदास के शब्दों में – बच्चे का पहला शब्द बोलना और पहला अक्षर लिखना एक करिश्मा होता है, ईश्वर का साक्षात रूप होता है.

लेकिन जैसे ही बच्चा बड़ा होता है, व्यवस्था बदल जाती है. एक अमीर का बच्चा सभी सुविधाओं के साथ स्कूल जाता है और गरीब का बच्चा बीच में ही पढ़ाई छोड़कर (Drop-out) बाल मजदूरी करने पर मजबूर हो जाता है.

मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च में तो हर माता-पिता अपने बच्चे को ले जाते हैं, लेकिन वे स्कूल क्यों नहीं पहुंचा पाते? जिन पूजा स्थलों पर सबसे ज्यादा फुटफॉल (Footfall) है, वे शिक्षा के लिए क्या कर रहे हैं? कुंभ, हज, क्रिसमस और गुरु पर्व जैसे शक्तिशाली धार्मिक माहौल में शिक्षा को प्राथमिकता क्यों नहीं दी जाती?

कुम्हार जैसे मिट्टी को आकार देता है, वैसे ही एक बच्चे को समर्थ नागरिक बनाना ही असली शिक्षा है. गाज़ियाबाद के ‘परिवर्तन स्कूल’ (Parevartan School) का उदाहरण हमारे सामने है, जहां एक सैन्य अधिकारी और उनकी पत्नी ने मिलकर गुरु-शिष्य परंपरा को पुनर्जीवित किया. हमारी सरकार का लक्ष्य हर स्कूल-कॉलेज को पूजा स्थल का दर्जा देना होगा. पाठ्यक्रमो में केवल रट्टा मारना नहीं, बल्कि अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, प्रबंधन, कानून और बहु-भाषी शिक्षा शामिल होगी.

संवेदनशीलता, सहिष्णुता और सर्वे भवन्तु सुखिनः

यजुर्वेद का श्लोक है:

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः.

(सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें.)

महाउपनिषद का ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और महाभारत का ‘अहिंसा परमो धर्मः’ हमें यह सिखाते हैं कि भारत की असली ताकत उसकी संवेदनशीलता और सहिष्णुता है. चाचा नेहरू ने भी कहा था कि जब तक हम आपसी सहयोग नहीं अपनाते, हम प्रगति नहीं कर सकते.

लेकिन आज द्वेष और धर्म की नफरत वाली राजनीति से लोकतंत्र को राजतंत्र में बदला जा रहा है. अयोध्या, प्रयागराज, काशी और मथुरा को केवल वोटों के लिए इस्तेमाल करना और सरयू-गंगा के नाम पर झूठी कसमें खाना देशद्रोह से कम नहीं है.

जब राम मंदिर के नाम पर एकत्र किए गए पावन चंदे में घोटाले की खबरें आती हैं, तो दिल रो उठता है. मेरी बहन सुषमा उपाध्याय (Sushma Upadhyay) ने अपनी कविता में भगवान राम से पूछा था:

“राम, क्या ऐसे मंदिर में तुम रह पाओगे?

जहां एक-एक सांस है भारी, लेकिन नहीं किसी की जिम्मेदारी…

क्या लाशों के अंबार की नींव पर तुम अपनी प्राण प्रतिष्ठा सह पाओगे!”

अगर धर्म के नाम पर अधर्म की दुकानें चलेंगी, तो भारत चुप नहीं रहेगा. 1992 में अयोध्या की घटना पर तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने भी कहा था कि वह पूरे राष्ट्र के लिए शर्म का विषय था. हमें धार्मिक कट्टरता के इस घाव को शिक्षा और सही संवाद से भरना होगा.

रोजगार: ‘श्रमेव जयते’ केवल एक स्लोगन नहीं है

अरस्तू ने कहा था— “नौकरी में खुशी काम में पूर्णता लाती है.” लेकिन आज भारत का युवा सड़कों पर बेरोजगारी का दर्द झेल रहा है. जब हाथों में हुनर है, तो काम क्यों नहीं है?

वोट देने की व्यवस्था इतनी सुचारू हो सकती है, तो रोजगार देने की व्यवस्था क्यों नहीं? बेरोजगारी भत्ता कोई स्थायी समाधान नहीं है; यह केवल निर्भरता की संस्कृति को जन्म देता है. महात्मा गांधी ने श्रम की गरिमा को सबसे ऊपर रखा था. जब तक हर हाथ को काम नहीं मिलेगा, तब तक भारत शांत नहीं बैठेगा.

गरीबी और संसाधनों का समान बंटवारा

कोई भूखा सोएगा, तो भारत बोलेगा. किसी एक नागरिक का भी संसाधन के अभाव में भूखा रहना देश का अपमान है. गरीबी सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सपनों और उम्मीदों की परीक्षा है.

गरीबों को केवल मुफ्त राशन देकर एक दायरे में बांध दिया गया है ताकि वे उसी कुएं में बने रहें. उन्हें वास्तविक अवसर नहीं दिए जाते. हमारी सरकार की प्राथमिकता आंकड़े गिनाना नहीं, बल्कि बैकलॉग के दानव को खत्म करके हर व्यक्ति को गरिमा और सम्मान का जीवन देना होगा.

एक बूढ़ी औरत जो गिलास से पानी भरकर आग बुझा रही थी, उसने सच ही कहा था: “मेरा नाम आग लगाने वालों में नहीं, आग बुझाने वालों में लिखा जाएगा.”

आइए, हम सब मिलकर अपनी आवाज को बुलंद करें. क्योंकि जब लोकतंत्र के स्तम्भ डगमगाएंगे, जब देश के युवाओं और श्रद्धालुओं को छला जाएगा, तब भारत केवल बोलेगा ही नहीं, बल्कि एक बड़ा बदलाव करके दिखाएगा!

जय हिंद!