स्थान एक ही है – दिल्ली का ऐतिहासिक इंडिया गेट. लेकिन दशकों के फासले से सामने आईं दो तस्वीरें इस देश के दो अलग-अलग दौर और मिजाज की कहानी बयां करती हैं.
पहली तस्वीर में राजीव गांधी और सोनिया गांधी इंडिया गेट के पास आइसक्रीम का लुत्फ उठाते नजर आते हैं. यह एक बेहद साधारण, शांत और निजी जीवन की बेफिक्र शाम का पल है. राजनीति के तामझाम से दूर, आम इंसान की तरह जिंदगी का आनंद लेते दो लोग.

दूसरी तस्वीर में उन्हीं के बच्चे – राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा – इंडिया गेट की उसी जमीन पर अंकिता भंडारी के पीड़ित माता-पिता के साथ नीचे बैठे दिखाई देते हैं. उत्तराखंड की बेटी अंकिता भंडारी, जिसकी जिंदगी 2022 में बेहद दर्दनाक तरीके से छीन ली गई थी, उसके माता-पिता अपने हक और न्याय की मांग लेकर इंडिया गेट पहुंचे थे. राहुल और प्रियंका उनके बीच बैठकर उनकी बातें सुन रहे हैं, उनके दर्द में साझीदार बन रहे हैं.

दो पीढ़ियाँ, दो दौर और एक बदलता भारत
ये दो तस्वीरें सिर्फ दो अलग-अलग मौकों की तस्वीरें नहीं हैं, बल्कि यह उस सफर की कहानी हैं जो भारत ने इन दो दशकों के बीच तय किया है:
निजी खुशी से सार्वजनिक संघर्ष तक: पहली तस्वीर एक परिवार की निजी और साधारण खुशी को दर्शाती है. वहीं दूसरी तस्वीर में उसी परिवार की अगली पीढ़ी एक दूसरे परिवार के उस दर्द से रूबरू हो रही है, जो अब एक सार्वजनिक संघर्ष बन चुका है.
सहानुभूति और सुनने की ताकत: आज के दौर में जब आम नागरिक को न्याय पाने के लिए सड़कों पर आना पड़ता है, तो वहां भाषण से ज्यादा जरूरी ‘सुनना’ हो जाता है. अंकिता भंडारी के माता-पिता के पास बैठकर उनके आंसुओं को सुनना और गवाह बनना सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि उस दर्द को महसूस करने की कोशिश है.
प्रगति के बीच खड़े कड़वे सवाल: एक तरफ हम आर्थिक और तकनीकी तरक्की का दावा करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ जब एक साधारण परिवार को अपनी बेटी के न्याय के लिए इंडिया गेट की सड़कों पर बैठना पड़े, तो यह लोकतंत्र और व्यवस्था पर कड़े सवाल खड़े करता है.
तस्वीर से परे न्याय का सवाल
पहली तस्वीर में जहां आइसक्रीम की मिठास और एक सुकून भरा माहौल है, वहीं दूसरी तस्वीर में उस पिता और मां का कभी न खत्म होने वाला दर्द और कड़वाहट है.
यह तुलना किसी राजनीति या पुरानी यादों तक सीमित नहीं है. यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि देश के तौर पर हम कहां पहुंचे हैं. किसी राजनेता का किसी पीड़ित के साथ बैठना और सुनना बहुत मायने रखता है, लेकिन बात सिर्फ फोटो खिंचवाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए.
अंकिता भंडारी के माता-पिता को सिर्फ एक तस्वीर या सांत्वना की जरूरत नहीं है; उन्हें जवाब चाहिए, निष्पक्ष जांच चाहिए और असली गुनहगारों को सजा चाहिए. क्योंकि जब तक आम नागरिक को न्याय के लिए सत्ता के सामने गिड़गिड़ाना पड़ेगा, तब तक न्याय की मांग लेकर भारत बोलेगा!

ज़मीनी सच्चाइयों से जुड़ी लेखनी