प्रार्थना स्थल पर हरियाली

बात जब ईश्वर की सबसे बहुमूल्य रचना की आती है, तो सर्वप्रथम मानवीय सृष्टि का नाम लिया जाता है. और बात जब इस सृष्टि की उत्तरजीविता पर आती है तो सबकी नज़र ईश्वर की प्रकृति पर जाती है. सरकारी तथ्यों के अनुसार यातायात वाहनों के बाद भवननिर्माण उद्योग प्रदूषण का सबसे बड़ा स्त्रोत है जो हमारी हरियाली को नुकसान पहुंचा रहे हैं.

हम जहां रहते हैं, काम करते हैं, मनोरंजन के लिए यदि कहीं जाते हैं, तो वो सब इमारतें कहीं न कहीं प्राकृतिक संपदा को चोट पहुंचा रही हैं. अब प्रश्न ये उठता है कि क्या इस क्षति को पूर्ण रूप से रोका जा सकता है? आदर्श रूप में हमें ऐसा करना चाहिए पर वास्तविक रूप में ये संभव नहीं है. हम निर्माण रोक नहीं सकते पर अपनी निर्माण प्रणाली में हरियाली भाल कर कुछ संशोधन ज़रूर कर सकते हैं जिससे कुछ प्रतिशत तक हम प्रकृति के साथ सामंजस्य बना सकेंगे.

भारत में और संपूर्ण विश्व में अब अनेक ऐसी संस्थाएं हैं जो भवन निर्माण प्रणाली में संशोधन के लिए कार्यरत हैं और अनेक राज्य सरकारों ने भी इसके प्रचार प्रसार के लिए कदम उठाए हैं. पर आज आवश्यकता है कि प्रत्येक नागरिक अपना कर्त्तव्य समझकर अपनी जीवन-शैली को संशोधित करे.

इस दिशा में हमारे धर्म स्थल और धार्मिक भवन हमारी राह रोशन कर सकते हैं. मंदिर, गुरूद्वारे, मस्जिद, गिरिजाघर एवं अन्य सभी धर्म स्थान एक इमारत के रूप में हमारे समाज में विराजमान हैं. भारत चूंकि धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं को सम्मान और निष्ठा से आदर देता है, इसलिए यदि इन धार्मिक इमारतों का विकास प्रकृति संरक्षण को केंद्र में रखकर किया जाएगा, तो निश्चय ही इसका हर नागरिक पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.

ऐसा करने से न केवल संरक्षण का सामाजिक व्यास बढ़ेगा, अपितु ये श्रद्धालुओं और दर्शनार्थियों के आध्यात्मिक एकाग्रता में भी वृद्धि करेगा.

हमें धार्मिक स्थलों का निर्माण पंच तत्वों को केंद्र में रखकर करना चाहिए जिससे हम सुनियोजित और सुव्यवस्थित रूप से अपने पर्यावरण को प्रदूषण से भी सुरक्षित कर सकें और कृत्रिम जगत से प्राकृतिक जगत की ओर अपनी यात्रा प्रारंभ कर सकें. पंच तत्वों का संदर्भ इसलिए जरूरी है कि ये किसी धर्म या जाति विशेष से संलग्न नहीं है, ये एक व्यापक तथ्य है जिसे सब मान सकते हैं.

प्रत्येक धार्मिक इमारत को चाहिए की उसकी भूमि पर अधिक से अधिक हरियाली हो, उसकी सीमा में कहीं भी जल का दुरूपयोग न हो, ऊर्जा (अग्नि) का संरक्षित रूप से प्रयोग हो, कृत्रिम शीत यंत्र के स्थान पर वहां हवा का संचालन सुनियोजित हो और अंत में कुछ स्थान ऐसे हों जहां खुले आकाश के नीचे खड़े हो सकें.

इस विचारधारा को जब थोड़ा व्यावसायिक भाषा में कहा जाता है तो ये सवह्नीय विकास अर्थात सस्टेनेबल डेवलपमेंट का विज्ञान कहलाता है. भारत की जनसंख्या का अंदाजा लगाना तो आसान है पर आज तक कोई भी भारत में धार्मिक इमारतों की गणना नहीं कर पाया. यदि सनातनम स्वामीनाथन के एक ब्लॉग को आधार माने, तो सरकार के अनुसार भारत में 1 लाख 8 हज़ार केवल मंदिर हैं परंतु ये गिनती भी पर्याप्त नहीं है.

माना जाता है कि भारत में न्यूनतम छह लाख मंदिर हैं जिनमें से सबसे ज्यादा आंध्र प्रदेश में हैं. ध्यान रहे, इस गिनती में चर्च, मस्जिद, गुरूद्वारे नहीं हैं. अब ज़रा सोचिए, यदि इतनी सारी इमारतें प्रकृति का संरक्षण करने में जुट जाएंगी, तो इससे जो हरियाली आएगी उसे सोच पाना भी कठिन है.

भारत बोल रहा है