गाड़ियों की लाल बत्ती गुल, अब बंगला भी जाए

लाल बत्ती यानी बीकन बत्तियों पर पाबंदी लग चुकी है. वीवीआईपी कल्चर समाप्त करने के लिए ये कदम उठाए गए. अब सिर्फ़ आपात सेवाओं की गाड़ियों पर ही आपको लाल बत्ती दिखेगी. इस निर्णय के पीछे तर्क है कि लाल बत्ती और सायरन का इस्तेमाल अंग्रेजी राज की याद दिलाता है.

पिछले 18 महीनों से सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, नेताओं की गाड़ियों पर लगने वाली लाल बत्ती को हटाने के प्रस्ताव पर काम कर रहे थे. गडकरी के अनुसार इस फैसले से राजनीति के एक नए दौर की शुरूआत हुई है.

चार साल पहले उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया था कि लाल बत्ती की गाड़ियों का इस्तेमाल केवल संवैधानिक पदों पर बैठे और अतिविशिष्ट व्यक्ति ही कर सकते हैं. कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के निवासी अभय सिंह की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए संबंधित क़ानून में संशोधन करने को भी कहा था.

अब जब सरकार ने इस दिशा में कदम उठाया ही है तो हाथ लगे अलग-अलग तरह की आवाज़ें निकालने वाले हॉर्न और रात में दिखते चीनी-जापानी तेज़ लाइट्स को भी सभी वाहनों से हटाने का निर्णय ले लिया जाए तो बेहतर होगा.

जहां सत्ता से जुड़े सदस्य अपना रसूख दिखाने के लिए अपनी गाड़ी पर लालबत्ती लगाकर घूमते फिरते रहे हैं वहीं रात में सड़कों पर अपना रोब दिखाने वास्ते लोग तेज़ रौशनी वाली तरह-तरह की लाइट्स का इस्तेमाल करते हैं जिनसे जनता को परेशानी होती है.

दिल्ली की आप सरकार ने फरवरी 2015 में घोषणा की थी कि उनके मंत्री अपनी आधिकारिक कारों में लाल बत्ती का इस्तेमाल नहीं करेंगे. वहीं कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पिछले महीने पंजाब के सीएम बनने के बाद और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी बिना लाल बत्ती के चलने का फैसला लिया था.

जैसे जैसे सांसदों और नेताओं को मिलने वाली प्रतिष्ठा कम होती जाएगी, राजनीति साफ सुथरी होती जाएगी.

लाल बत्ती के इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद अब बंगला संस्कृति भी सरकार ख़त्म करे तो जनता और नेता के बीच की खाई भरने में काफी मदद मिलेगी. देश की राजधानी दिल्ली और राज्यों की राजधानियों में सांसदों, मंत्रियों और विधायकों को दो से पांच एकड़ में फैले बंगले मिले हुए हैं. ज़ोर शोर से उन्हें भी छीनने की योजना बननी चाहिए.

इसी तरह राष्ट्रपति भवन भी सैकड़ों एकड़ में फैला है. सभी सांसदों को वहां के फ्लैट में स्थानांतरित किया जा सकता है. इससे सुरक्षा में भी सालाना करोड़ों रुपए की बचत होगी. अभी हर बंगले के गेट पर चार सिपाही हमेशा सावधान की मुद्रा में अमानवीय तरीके से खड़े रहते हैं, ये सब देश की सेवा में काम आएंगे. ख़ाली होने वाले बंगलों से सरकार सालाना अरबों रुपये किराया कमा सकती है या उनका यथोचित इस्तेमाल कर सकती है.

भारत बोल रहा है